COVID 19 IN SURAT : श्रमिक बस्तियों में पसरने लगा सन्नाटा, आधे से अधिक गए गांव, बचे हुए भी परेशान

- लॉकडाउन की आशंका और संक्रमण से सहमे...

- आधे से अधिक गए गांव, बचे हुए भी परेशान

- Faced with the possibility of lockdown and infection ...

- More than half of laborsleft for thair natives , even others are worried to survive

By: Dinesh M Trivedi

Published: 16 Apr 2021, 12:04 PM IST

दिनेश एम.त्रिवेदी/ मुकेश त्रिवेदी

सूरत. शहर में कहर ढा रहे कोरोना संक्रमण व उसकी परिस्थितियों के चलते लॉकडाउन की आशंका बलवती हो रही है। सरकार भले ही इसे नकार रही है, लेकिन दूध के जले श्रमिक इसे दोबारा झेलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। शायद यहीं वजह है कि शहर की श्रमिक बस्तियों में अब सन्नाटा पसरता जा रहा हैं। आधे से अधिक श्रमिक अपने वतन जा चुके हैं। गुरुवार को पत्रिका ने गोडादरा गांव व नहर क्षेत्र के इलाकों का दौरा किया।

यहां कपड़ा बाजार व अन्य दिहाड़ी कार्यो में संलग्न हजारों प्रवासी श्रमिक किराए के छोटे - छोटे कमरों में रहते हैं। यहां अधिकतर इमारतों में सन्नाटा पसरा हुआ नजर आया। इन इमारतों के कमरों पर भी ताले मिले। यहां कई इमारतें अवैध रूप से बनी हुई हैं। इसलिए इनके मकान मालिक खुल कर बात करने से कतराते हैं। एक इमारत के मालिक ने बताया कि उनके 24 कमरे किराए पर दिए हुए थे, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर की शुरुआत से अब तक 16 खाली हो चुके हैं।

इनमें रहने वाले उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड के श्रमिक कमरे खाली कर जा चुके हैं। उन्हें डर हैं कि यदि फिर लॉकडाउन हो गया तो वे यहीं फस जाएंगे। काम बंद हो जाएगा तो खाने के लाले पड़ जाएंगे। कमरे का किराया और खर्च कहां से जुटाएंगे। इससे बेहतर है कि गांव या खेतों में काम कर दो जून की रोटी तो जुटा लेंगे। कुछ ऐसा ही हाल क्षेत्र के अन्य गली मोहल्ले का भी दिखा।

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यहां 60 से 70 फीसदी कमरे व मकान खाली हो चुके हैं। इन बस्तियों में जो लोग मौजूद मिले उनकी हालत अब धीरे-धीरे पतली हो रही है। बस्तियां खाली होने से उनकी आजीविका भी प्रभावित हो रही है। कमोबेश यही हालात शहर की अन्य श्रमिक बस्तियों के भी है।


कोई ग्राहक ही नहीं आता :

गोडादरा की श्रमिक बस्ती में किराने की दुकान चलाने वाले भीलवाड़ा के मूल निवासी लालाराम मेवाड़ा ने बताया कि बस्ती खाली हो चुकी है। 70 फीसदी श्रमिक जा चुके हैं। पिछले कई दिनों से दुकान खोल कर बैठते हैं, लेकिन ग्राहक नहीं आते। अब तो यह सोच कर डर लगता हैं कि हालात और खराब हुए तो उनके परिवार क्या होगा!

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वहीं, रेहड़ी पर पानीपुरी बेचने वाले युवक ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से घर से रेहड़ी लेकर कम ही निकलता हूं। सडक़ पर खड़ा रहता हूं तो पुलिस और मनपाकर्मी परेशान करते हैं। कोरोना का डर और बस्ती खाली होने से ग्राहक भी नहीं मिलते है।

पति की समोसे की दुकान बंद हो गई :

लखनऊ निवासी गोविंद मिश्रा की पत्नी ने बताया कि उनके पति की चाय-नाश्ते की दुकान लॉकडाउन में बंद हो गई थी। किराया भी चढ़ गया। हालात सुधरने के बाद जैसे -तैसे इंतजाम कर फिर दुकान शुरू की थी।

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लेकिन महीना भर पहले ही फिर बंद करनी पड़ी। पति की मदद के लिए वह भी घर पर सिलाई का काम करती हैं, लेकिन उतना काम ही नहीं मिलता।

जुबान पर शादी की बात और मन में लॉकडाउन का डर :

गोडादरा की श्रमिक बस्ती से गुरुवार दोपहर अपने दो मित्रों के साथ थैले उठा कर स्टेशन जा रहे वकील पंडि़त से जब हमने पूछा कि कहां जा रहे हैं तो उन्होंने बताया कि गांव में शादी है। इसलिए झारखंड जा रहे हैं। शुरू वे रिपोर्टर को पहचान नहीं पाये। जब हमने पहचान देकर भरोसे में लिया तो धनबाद जिले के मूल निवासी वकील ने बताया कि वह कपड़ा बाजार में कटिंग का काम करते हैं। काम बंद तो नहीं हुआ, लेकिन कम हो गया है। जिसके चलते डर हैं कि कहीं लॉकडाउन में नहीं फंस जाए। इसलिए गांव जा रहे हैं। वहां रिश्तेदार की शादी भी है।

लॉकडाउन में जहर खाने वाला लौटकर सूरत नहीं आया :


पिछले साल गोडादरा के शक्तिनगर में रहने वाले एक श्रमिक वशिष्ठ ने बच्चों के लिए दूध के रुपए भी नहीं होने के कारण जहर खा लिया था। उसे न्यू सिविल अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। उसकी खबर सामने आने पर प्रशासन व कई संस्थाओं ने फौरी सहायता दी थी। लॉकडाउन खुलने पर वह परिवार के साथ उत्तरप्रदेश लौट गया था। गुरुवार को जब पत्रिका टीम उसके मकान मालिक से मिली तो उसने बताया कि वह फिर लौट कर सूरत नहीं आया। वहीं पर रंग - रोगन का काम करता है।

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Dinesh M Trivedi Reporting
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