राजनीति के बदलते रंग-ढंग गंभीर संकेत

राजनीति के बदलते रंग-ढंग गंभीर संकेत

Vineet Sharma | Publish: Feb, 07 2018 10:08:59 PM (IST) Surat, Gujarat, India

जन प्रतिनिधियों के रवैये पर आमजन ने जताई नाराजगी

सूरत. मनपा मुख्यालय में मंगलवार को जो कुछ हुआ, उसे आम जन पचा नहीं पाया। लोगों ने जहां जन प्रतिनिधियों के रवैये पर ऐतराज जताया, समाज विज्ञानियों ने राजनीति की दशा और दिशा में हो रहे बदलाव को भविष्य के लिए गंभीर संकेत बताया।

जनता से चुने गए जनप्रतिनिधि जनहित के नाम पर राजनीति की रोटियां जिस तरह सेंकते हैं, उससे आमजन आहत होता है। मंगलवार को मनपा मुख्यालय में जो कुछ हुआ, वह इसी राजनीति की अगली कड़ी है। लोगों के मुताबिक विरोध का यह तरीका बदला नहीं गया तो राजनीति की बिगड़ती दशा को सही दिशा मिलना मुश्किल है। लोग इस बात से तो इत्तफाक रखते हैं कि लोकतंत्र में विरोध ही असहमति का हथियार है, लेकिन गांधी के देश में उसके हिंसक होने से उन्हें ऐतराज है।

बजट में कर की प्रस्तावित दर वृद्धि के विरोध में विपक्ष के पार्षदों ने जिस तरह हंगामा किया, वह काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है। लोगों का मानना है कि विपक्ष ने इसी मामले पर दो दिन पहले लोगों के बीच जाकर हस्ताक्षर अभियान चलाया था और गुलाब के फूल भेंट कर जागरुकता के जो प्रयास किए थे, उसके सकारात्मक परिणामों का इंतजार किया जाना चाहिए था। उनके मुताबिक जनहित के नाम पर सर्वजन की संपत्ति को जिस तरह नुकसान पहुंचाया गया, उसमें जनहित ढूंढना बड़ा मुश्किल है।


यह है मामला

मनपा आयुक्त एम. थेन्नारसन ने 30 जनवरी को वित्त वर्ष 2018-19 के लिए 5378 करोड़ रुपए का ड्राफ्ट बजट पेश करते हुए संपत्ति कर और यूजर चार्जेज में वृद्धि का प्रस्ताव दिया था। कांग्रेस ने पहले ही दिन से इस वृद्धि का विरोध किया और आयुक्त को ज्ञापन सौंपा था। वराछा में हस्ताक्षर अभियान चलाया और सर्किट हाउस के समीप लोगों को गुलाब का फूल भेंट कर बजट में कर वृद्धि प्रस्ताव का गांधीगीरी से विरोध किया। बजट प्रस्ताव पर चर्चा के लिए जब मंगलवार को स्थाई समिति की बैठक शुरू हुई, कांग्रेस पार्षदों ने गांधीगीरी को ताक पर रखते हुए जमकर हंगामा किया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। राजनीतिक मर्यादा ताक पर रखते हुए पार्षदों का रेला सभाखंड में पहुंच गया और वहां भी हंगामा किया।


बदलाव से समाज विज्ञानी चिंतित

राजनीति में विरोध की धार जिस तरह से बदल रही है, उससे समाज विज्ञानी भी चिंतित हैं। उनके मुताबिक यह महज सूरत शहर का मामला नहीं है, देशभर में विरोध के तरीके में बदलाव दिख रहा है। लोग अपनी बात को उचित तरीके से उचित मंच पर रखने के बजाय शार्टकट अपना कर सस्ती लोकप्रियता पाना चाहते हैं। इसे किसी एक राजनीतिक दल के परिपेक्ष्य में देखने से ज्यादा जरूरी है कि कोई भी पक्ष एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता के भाव को खो रहा है।


विरोध में पहले भी पार हुई सीमा

समाज विज्ञानियों के मुताबिक यह पहला मौका नहीं है, जब विरोध की सीमा का उल्लंघन किया गया हो। राजनीतिक लाभ के लिए यह सीमा हर बार नए तरीके से लांघी जा रही है। यूपीए सरकार के दौरान सांसद सी.आर. पाटिल ने अपने समर्थकों के साथ बेहतर हवाई सेवाओं के नाम पर रनवे पर प्लेन तक रोकने की कार्रवाई की थी। देश ही नहीं, दुनियाभर में विरोध का यह पहला और अकेला मामला है, जब प्लेन को रनवे पर ही रोक लिया गया हो। उनके मुताबिक राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ जब दलीय फायदा-नुकसान हावी हो जाता है तो मर्यादा बंधन खोल देती है।


लोगों से लेते राय


विरोध के लिए हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। जो तोडफ़ोड़ हुई, उसमें डिसिप्लेन तो दिखा ही नहीं, जनता का ही नुकसान हुआ। पहले लोगों के बीच जाकर उनकी राय जानते और फिर जनता को साथ लेकर आगे आते तो विरोध ज्यादा मुखर होता।
गीता श्रॉफ, वेसू


चिंताजनक हालत


यह बात बहुत ही चिंता की है कि अब सभी लोग संघर्ष की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। पहले बातचीत से या धरना करने से मुद्दों के हल निकले जाते थे, अब नारेबाजी से, हंगामे से और आंदोलनों से काम करवाने या काम निकलवाने का तरीका अपनाया जा रहा है। ऐसा न हो कि आज विरोध पक्ष के प्रतिनिधि जो रास्ता अपना रहे हैं, कल प्रजा भी इसी रस्ते पे चल पड़े।
डॉ. सोनल रोचानी, अडाजण


रोटियां सेक रहे हैं


विरोध के तरीकों में हिंसा को कोई जगह नहीं। पक्ष चाहे जो हो, उसकी जिम्मेदारी है कि वह जनता के प्रतिनिधि के रूप में ही पेश आए। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान सीधे तौर पर आमजन का नुकसान है। जनहित के नाम पर हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी रोटियां सेक रहे हैं।
दिलीप मोदी, उधना

यह कैसा विरोध?


बजट में टैक्स बढ़ाया है, जिसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है। इसके बावजूद विरोध का यह तरीका गलत था। राजनीति में मर्यादा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। विरोध के दूसरे तरीके हैं, जो ज्यादा प्रभावी साबित होते।
चंचल अग्रवाल, वेसू

 

जनता के बीच जाते

जनता ने चुनकर भेजा है, उनके बीच जाना चाहिए था। लोगों को इसका असर बताते और उन्हें साथ लेकर सत्तापक्ष पर दबाव बनाते तो एक आदर्श पेश करते। उन्हें बोर्ड में भाजपा ने नहीं जनता ने चुनकर भेजा है। जनता के बीच जाकर आंदोलन करना था और माहौल बनाना था।
हरीश गुर्जर, वराछा


क्या संदेश दिया
जिम्मेदार लोग हैं और जनप्रतिनिधि इस तरीके से विरोध कर लोगों को क्या संदेश देना चाहते हैं। लोग राजनेताओं को मॉडल के रूप में देखते हैं। उनकी हर गतिविधि पर लोगों की नजर रहती है। विरोध सार्थक होता, यदि यह जन आंदोलन बनता।

आशा अग्रवाल, अडाजण


पंगु प्रशासन के चलते भीड़तंत्र बनी व्यवस्था


प्रशासन के पंगु हो जाने के कारण व्यवस्था भीड़तंत्र मेंं तब्दील हो गई है। विरोध के नाम पर अराजकता फैला कर व्यवस्था को गिरवी रखना ही मकसद होता जा रहा है। कोई भी पक्ष हो, विरोध के इस तरीके का समर्थन नहीं किया जा सकता।
सुनील जैन, पार्ले प्वाइंट

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