EDUCATION DEPT : विद्यालयों में मोमो चैलेंज गेम खेलने पर लगाया गया प्रतिबंध

EDUCATION DEPT : विद्यालयों में मोमो चैलेंज गेम खेलने पर लगाया गया प्रतिबंध

Divyesh Kumar Sondarva | Publish: Dec, 08 2018 08:31:42 PM (IST) Surat, Surat, Gujarat, India

राज्य शिक्षा विभाग ने जारी किया आदेश

जिला शिक्षा अधिकारी को आदेश का पालन करवाने का जिम्मा

सूरत.

ऑनलाइन खेले जाने वाले मोमो चैलेंज गेम पर राज्य शिक्षा विभाग ने प्रतिबंध लगाया है। आदेश का पालन करवाने का जिम्मा जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपा गया है।
ब्लू व्हेल गेम की तरह ही मोमो चैलेंज गेम भी जानलेवा साबित हुआ है। ऑनलाइन गेम को खेलने वाले खिलाड़ी को कई खतरनाक चैलेंज दिए जाते हंै। चैलेंज पूरा करने के चक्कर में खिलाड़ी आत्महत्या तक कर लेता है। वाट्सएप के माध्यम से युवाओं को मोमो का लिंक भेजा जाता है। इस लिंक में बिल्ली की आकृत्रि होती है, जिसकी आंख मोमो जैसी है। इसलिए इसका नाम मोमो चैलेंज है। राजस्थान और पश्चिम बंगाल में मोमो गेम खेलने के कारण कई युवाओं की जान चली गई हैं। इसलिए इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठी। गुजरात के विद्यालयों के विद्यार्थी इस गेम का शिकार ना बनें, इसलिए शिक्षा विभाग से गेम पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। राज्य शिक्षा विभाग ने मोमो गेम पर प्रतिबंध लगाया है। सभी विद्यालयों को इस बारे में परिपत्र जारी कर प्रतिबंध पर अमल करने का आदेश दिया गया है।

आदेश का पालन नहीं
गुजरात में कई साल पहले बोझ बिना पढ़ाई का आदेश जारी किया गया था, लेकिन इस आदेश का भी पालन नहीं हुआ। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय भी इस नियम पर ध्यान नहीं दे रहा है। विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने के लिए अभिभावक निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते हैं। निजी स्कूलों ने अपना प्रदर्शन बेहतर करने के लिए बच्चों को मशीन बना रखा है। बच्चों पर पढ़ाई का अतिरिक्त बोझ डाला जाता है। अभिभावकों से तगड़ी फीस वसूली के साथ कताबों पर भी अतिरिक्त खर्च करवाया जाता है। किताबों के बोझ से बच्चों की कमर झुक जाती है।

 

अदालती आदेश भी बेअसर

भारी बस्ते से न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है, वह पढ़ाई में भी ध्यान नहीं लगा पाते। कई शिक्षा संगठनों, अभिभावकों, डॉक्टर आदि ने समय-समय पर भारी बस्तों का वजन कम करने की कोशिशें कीं, लेकिन कुछ खास नहीं हुआ। मुम्बई हाइकोर्ट ने वर्ष 2016 में शिक्षा विभाग को आदेश दिए थे कि वह बच्चों के बस्तों का वजन कम करे और ऐसा करने के लिए जरूरत पड़े तो स्कूलों का अचानक दौरा भी किया जाए। हाइकोर्ट के इस आदेश पर भी शिक्षा विभाग ने बस्ते हल्के करने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मुम्बई हाइकोर्ट ने कहा था कि स्कूल टीचर और अभिभावकों को इस बारे में जागरुकता पैदा करनी चाहिए कि अगर बस्ते का वजन कम नहीं हुआ तो बच्चों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ सकता है। मेडिकल रिपोर्टों से साबित हो चुका है कि छोटे बच्चे भारी बस्ते नहीं उठा सकते, इस कारण उनकी पीठ और कंधों में दर्द रहता है।

किताबों को लेकर भी आदेश का पालन नहीं
गुजरात बोर्ड और सीबीएसइ बोर्ड ने बोर्ड की किताबों से ही पढ़ाने का आदेश दे रखा है, लेकिन कोई निजी स्कूल इस आदेश का पालन नहीं करता। निजी स्कूल अभिभावकों को मनपसंद निजी प्रकाशन की किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। इस मामले में कई बार अभिभावकों ने शिकायत की, लेकिन किसी निजी स्कूल पर आज तक किताबों को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की गई। किताबें खरीदने पर अभिभावकों को 5 हजार से 10 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं।

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