वन नेशन-वन टैक्स ने सूरत के कपड़ा उद्योग का घोंट दिया दम!

केन्द्र सरकार ने वन नेशन-वन टैक्स के सूत्र के तहत जीएसटी को लागू किया। इसके पीछे मंशा भले श्रेष्ठ रही, लेकिन इसकी ‘गणित’ ने सूरत के कपड़ा...

By: मुकेश शर्मा

Published: 20 Jul 2018, 10:59 PM IST

सूरत।केन्द्र सरकार ने वन नेशन-वन टैक्स के सूत्र के तहत जीएसटी को लागू किया। इसके पीछे मंशा भले श्रेष्ठ रही, लेकिन इसकी ‘गणित’ ने सूरत के कपड़ा उद्योग की दशा और दिशा दोनों बिगाड़ दी। टैक्स की लम्बी-चौड़ी और जटिल प्रक्रिया के भुनगे में उलझे छोटे कपड़ा व्यापारियों को अपना कारोबार बंद करना ज्यादा आसान लगा और उन्होंने दूसरे व्यापार की ओर मुंह मोड़ लिया। एक लाख से ज्यादा लूम्स मशीनें भंगार हो गईं तो ५० हजार एम्ब्रॉयडरी मशीनें ठप पड़ गईं।

इसका बड़ा असर इस रूप में सामने आया कि करीब चार लाख लोग बेरोजगार हो गए। हालांकि कारोबार को बचाने के लिए सूरत के कपड़ा उद्यमियों ने बार-बार अपनी पीड़ा सरकार के समक्ष व्यक्त की, लेकिन सरकार को हर बार यह लगा कि सूरत के व्यापारी वन नेशन-वन टैक्स के खिलाफ जा रहे हैं। इसके चलते न समाधान की राह निकल पाई और न ही बीच की राह बन पाई। वन नेशन-वन टैक्स को रविवार को एक साल पूरा होने जा रहा है। ऐसे में बीते ३६५ दिनों में क्या हालात सामने निकल कर आए, आइए डालते हैं इस पर खासनजर....।

हजारों दुकानें खालीं

गत वर्ष एक जुलाई को जीएसटी लागू होने के पहले दिन से सूरत के कपड़ा कारोबारी इसका विरोध कर रहे थे। इसको रोकने के लिए 65 हजार व्यापारियों ने 21 दिन अपनी दुकानें बंद कर विरोध जताया। जीएसटी संघर्ष समिति बनाकर केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली तक अपनी सभी मांगें पहुंचाईं। लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। हालात यह हैं कि सूरत के सभी बाजारों में करीब 10 हजार दुकानें खाली पड़ी हैं। कपड़ा व्यापार घटने का असर रोजाना रोजी-रोटी कमाने वाले टैम्पो चालक, पार्सल उठाने वाले और कटिंग-पैकिंग करने वालों पर भी पड़ा। ऐसे एक लाख लोगों की रोज की कमाई बंद हो गई।

वीवर्स की कमर टूटी

सूरत में 12 मशीन से लेकर 1200 मशीन चलाने वाले वीवर्स हैं। जीएसटी से पहले छोटे-बड़े सभी वीवर्स को पर्याप्त काम मिलता था, लेकिन अब सबकी मुसीबत बढ़ गई है। बड़ी समस्या इनपुट टैक्स क्रेडिट ने बढ़ा दी। व्यापारियों का लगभग एक हजार करोड़ का रिफंड देने में सरकार आना-कानी कर रही है। इससे भी वीवर्स निराश हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटे वीवर्स लूम्स मशीनों को भंगार में बेच रहे हैं। लगभग एक लाख से ज्यादा मशीनें बिक चुकी हैं और तीन लाख लोगों का रोजगार छिन गया है। एक साल पहले प्रतिदिन चार करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन होता था, जो अब दो लाख पर आ गया है।

प्रोसेसर्स भी पस्त

प्रोसेसर्स की मानें तो जीएसटी से जॉबवर्क घटता जा रहा है। दक्षिण गुजरात में लगभग 400 से अधिक डाइंग प्रोसेसिंग यूनिट हैं। उनका 500 करोड़ रुपए का इनपुट टैक्स क्रेडिट सरकार की तिजोरी में पड़ा है। इस बारे में उन्होंने राजस्व सचिव हसमुख अढिय़ा, कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी से लेकर सबके दरवाजे खटखटाए, लेकिन कहीं बात नहीं बनी। एक ओर कलर-केमिकल सहित तमाम रॉ-मेटेरियल्स की कीमत लगातार बढ़ रही है, लेकिन जीएसटी के कारण उद्यमियोंं के पास काम नहीं होने से वे कम कीमत पर भी जॉबवर्क ले रहे हैं। फिनिश्ड फैब्रिक्स में मदी के कारण उनको भी सप्ताह में दो दिन अवकाश की नौबत है।

हीरा उद्योग चकराया

हीरा उद्योग में भी ज्यादातर कारखाना संचालक कम पढ़े-लिखे या तकनीकी ज्ञान से अनजान हैं। ऐसे में जीएसटी से उन्हें भी व्यापार करना मुश्किल हो रहा है। जीएसटी नियमों से अनजान होने के कारण रिटर्न फाइल करने और टैक्स क्रेडिट लेने में परेशान हो रहे हैं। पहले रफ हीरों पर इम्पोर्ट ड्यूटी नहीं लगती थी, अब 0.25 प्रतिशत होने से रफ हीरों की कीमत बढ़ी है। हीरा उद्यमी महेन्द्र नावडिय़ा ने बताया कि जीएसटी ने हीरा व्यापारियों की उलझनें बढ़ा दी हैं। एकाउन्ट व्यवस्थित रखने का खर्च चार गुना हो गया है। व्यापारी नियमों से अनजान हैं। टैक्स क्रेडिट किस तरह लेना है, यह नहीं पता है।

मुकेश शर्मा Reporting
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