चाय की थड़ी पर हार-जीत का हिसाब-किताब

राजनीतिक विशेषज्ञ हैरान हैं और पार्टियों के दिग्गज परेशान, लेकिन चाय की थड़ी और पान के गल्लों पर प्रत्याशियों की हार-जीत तय हो रही है। राजनीति के शौकी

By: मुकेश शर्मा

Published: 11 Dec 2017, 09:07 PM IST

सूरत।राजनीतिक विशेषज्ञ हैरान हैं और पार्टियों के दिग्गज परेशान, लेकिन चाय की थड़ी और पान के गल्लों पर प्रत्याशियों की हार-जीत तय हो रही है। राजनीति के शौकीनों ने तो शहर के चुनाव ट्रेंड देखकर राज्य में सरकार भी तय कर दी है, जबकि समर्थक भी प्रत्याशियों की जीत के गणित में उलझे हुए हैं।

विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए शनिवार को मतदान संपन्न होने के बाद से हार और जीत का आंकलन शुरू हो गया है। इस बार जहां मतदान बूथों के बाहर खड़े चुनाव विश्लेषक मतदाताओं के मिजाज को समझने में बुरी तरह विफल रहे, पार्टी नेताओं के लिए भी पूरी तरह हवा का रुख पकड़ पाना संभव नहीं हो पाया। मतदान के दौरान अंदाजे पर आंकड़े जुटा रहे विशेषज्ञों का तीर निशाने पर लगे या नहीं, राजनीतिक चर्चाओं में माहिर आम आदमी यहां भी अपना गणित बिठाने में जुटा है।

शनिवार देर रात तक और गुरुवार सुबह से जहां चार लोग जुटे, अजनबियों के बीच चर्चा का एकमात्र एजेंडा चुनाव रहा। प्रत्याशियों की हार-जीत से शुरू होने वाली चर्चा कब राज्य में सरकार बनाने तक पहुंच जाती, पता ही नहीं चलता था। अपने समर्थन में उनकी दलीलें भले सेफोलॉजिस्ट के गले नहीं उतरें, लेकिन हार-जीत का फासला भी यहां तय हुआ।

सियासी दल असमंजस में


प्रदेश विधानसभा चुनाव के इतिहास में संभवत: यह पहला मौका है, जब चुनावी तस्वीर साफ नहीं है। यही वजह है कि पहले दौर के बाद बीजेपी-कांग्रेस के दिग्गज असमंजस में हैं। शहर की १२ सीटों पर हुए मतदान के बाद जानकारों के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि सियासी लहर किसके पक्ष में बही है। मतदान के दौरान हर पांच सौ मीटर पर लोगों का मिजाज बदलता दिखा। कमोबेश हर जगह बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषक भी इस बात पर सहमत होते दिखे कि भाजपा सरकार भले बचा ले, लेकिन कांग्रेस की ताकत बढ़ेगी।

बीजेपी-कांग्रेस के दावे

पहले दौर के मतदान के बाद बीजेपी और कांग्रेस असमंजस में हैं। इसके बावजूद दोनों दलों की ओर से जुबानी बढ़त के दावे किए जा रहे हैं। दोनों दलों का मकसद बाकी बची 93 विधानसभा सीटों पर मतदान से पहले माहौल अपने पक्ष में बनाना है। गौरतलब है कि दूसरे चरण में १४ दिसंबर को उत्तर गुजरात और सेंट्रल गुजरात के विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होना है।

कम मतदान के असर का आंकलन

विधानसभा चुनाव के पहले दौर में शनिवार को दक्षिण गुजरात की ३५ सीटों पर वर्ष २०१२ के मुकाबले कम मतदान हुआ है। वर्ष २०१२ में मतदान का आंकड़ा ७० फीसदी पार गया था, जबकि इस बार यह ६५ पर अटक गया। दोनों ही दल कम और अधिक मतदान को अपने लिए फायदे का सौदा बता रहे हैं। उनका मानना है जहां मतदान कम हुआ, वहां विपक्षी दल के मतदाता बाहर नहीं आए और जहां मतदान ज्यादा हुआ, उनके समर्थकों ने खुलकर मतदान किया।

विनीत शर्मा

मुकेश शर्मा Reporting
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