यहां की छाछ है खास

यहां की छाछ है खास

Dinesh M.Trivedi | Publish: Nov, 10 2018 08:35:22 PM (IST) | Updated: Nov, 10 2018 08:35:23 PM (IST) Surat, Gujarat, India

गोडादरा स्थित आसपास दादा के मेले में उमड़ी भीड़

सूरत. मंदिरों में आपने मिठाई, पंचामृत आदि तो प्रसाद रूप में ग्रहण किए होंगे लेकिन शहर के गोडादरा क्षेत्र में स्थित आस पास दादा मंदिर पर प्रसाद के रूप में छाछ दी जाती है। श्रद्धालुओं का मानना हैं कि यह छाछ बहुत खास है। यह न सिर्फ शरीर पर विष के दुष्प्रभाव को कम करती है बल्कि कई दिनों तक घर में रखने पर खराब भी नहीं होती है।


एक दंत कथा के मुताबिककिसी समय गोड़ादरा व निकटवर्ती अन्य गांवों में सांपों का आतंक था। जिसकी वजह से इस क्षेत्र किसानों का अपने खेतों में काम करना मुश्किल हो गया था। कई लोग यहां से पलायन करने के लिए मजबूर हो गए थे। उसी दौरान कहीं से भ्रमण करते हुए महर्षी आस्तिक (आसपास दादा) के शिष्य गोडादरा में पहुंचे। उन्होंने गांव के तालाब के निकट पडाव डाला। इस पर सर्पदंश से पीडि़त लोग उपचार के लिए उनके पास पहुंचने लगे।

 

वे लोगों को महर्षी आस्तिक के नाग जाती पर उपकार की पौराणिक कथा सुनाते थे तथा नाग दिखाई देने पर महर्षि आस्तिक का स्मरण करने के लिए कहते थे। ऐसा करने पर उनके खेतों से सांप चले जाते थे। वहीं सर्पदंश से पीडि़त व्यक्ति उनके पास पहुंचता था तो वे उसे छाछ पीने के लिए देते थे। जिसकी वजह से पीडि़त विष के दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाता था। तब से इस क्षेत्र के लोग महर्षि आस्तिक की आराधना करने लगे। धीरे-धीरे इस क्षेत्र में सांपों का आतंक कम हो गया। कालान्तर में तालाब के निकट उन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया तथा मंदिर पर मेले की शुरुआत हुई। बताया जाता है कि यहां की छाछ कई दिनों तक रखने पर भी खराब नहीं होती है।

 

महर्षि आस्तिक ने नाग जाती को बचाया था


बताया जाता है कि पौराणिक काल में महर्षि आस्तिक (आस पास दादा) ने नागजाति को उसके समूल विनाश से बचाया था। पांडवों के वंशज राजा परिक्षित की तक्षत नाग के दंश मृत्यु हुई थी। उनकी मृत्यु से आहत उनके पुत्र जन्मेजय ने सिहासन पर बैठते ही संसार से नाग जाती के समूल विनाश का संपल्प लिया था। उन्होंने तक्षत नाग को हराया। उसके बाद सर्प यज्ञ के साथ समस्त नाग जाति का विनाश शुरू कर दिया।

उस दौरान नाग जाति ने महर्षि आस्तिक से गुहार लगाई। महर्षि आस्तिक के पिता ब्राह्मण थे और माता नाग जाति की थी। महर्षि आस्तिक के समझाने पर जन्मेजय ने सर्प यज्ञ बंद किया। आस्तिक ने नागजाति को उसके कोप से बचाया। तब से नागजाती स्वयं पर महर्षि आस्तिक का उपकार मानती है। जहां कहीं महर्षि आस्तिक का स्मरण होता है। नाग वहां किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते है। वे वहां से चले जाते है।


दिनेश एम.त्रिवेदी

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