इंद्र को जीतना आसान, इंद्रियों को जीतना मुश्किल

इंद्र को जीतना आसान, इंद्रियों को जीतना मुश्किल

Dinesh M Trivedi | Publish: Oct, 13 2018 01:16:53 PM (IST) Surat, Gujarat, India

सुरभि शक्ति आराधना महोत्सव

सूरत. पथमेड़ा गोधाम महातीर्थ, सूरत इकाई की ओर से नवरात्र पर्व के उपलक्ष में आयोजित श्रीसुरभि शक्ति आराधना महोत्सव के तीसरे दिन शुक्रवार को दिव्य अनुष्ठान की शुरुआत सुबह वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा यज्ञधेनु की पूजा-अर्चना से की गई। इसके बाद श्रीमद्देवी भागवत कथाकार त्रम्बकेश्वर चैतन्य महाराज ने बताया कि इन्द्र को जीतना आसान है, इन्द्रियों को जीतना मुश्किल है। जिस किसी ने भी इन्द्रियों पर नियंत्रण पा लिया मानो उसने जगत को जीत लिया। जिस देश में स्वयं परमात्मा ने गाय की सेवा की हो और कन्याओं का देवी रूप में पूजन होता हो, उस देश में गो हत्या-भ्रूण हत्या रही है। जो पतन का मूल कारण है। नवरात्रि में कन्या को देवी मानकर पूजा करते हैं, लेकिन गो एवं कन्या के संरक्षण के लिए खड़े नहीं होते। गो हत्या-भ्रूण हत्या का कलंक मिटने पर ही सही अर्थों में गो पूजन एवं कन्या पूजन सार्थक होगा। जिस देश में माता-पिता को देव का स्थान दिया गया हो। आज उस देश में वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं। यह हमारे समाज के कथनी-करनी का फल है। उन्होंने शुकदेवजी एवं विदेह जनक का प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जब शुकदेवजी मिथिला पहुंचते हैं तो द्वारपाल शुकदेवजी के शांत चित्त को भाप कर अंदर आने को इंगित करते हुए ऋषि से पूछता है कि महाराज इस संसार में सुख-दुख एवं शत्रु-मित्र कौन है? ऋषिवर कहते हैं कि सुख-दुख का संबंध मन के साथ है, जो मन को अच्छा लगे वह सुख और जो मन को अच्छा नहीं वह दुख है। लेकिन ज्ञानी एवं भक्त के सुख-दुख हैं ही नहीं। पुत्र को माता-पिता की एवं शिष्य की गुरु की सेवा करना चाहिए। यह पुत्र एवं शिष्य का कर्तव्य होना चाहिए न कि माता-पिता एवं गुरु का अधिकार।

शाम को होगा नानीबाई रो मायरो


राकेश कंसल ने बताया कि 13 से 15 अक्टूबर के दौरान गोवत्स राधाकृष्ण महाराज नानीबाई रो मायरो सुनाएंगे। प्रति दिन सायं 7.30 बजे से रात्रि 10.30 बजे तक मायरो का आयोजन होगा।

108 जोड़ों ने किया गो पूजन


सायंकाल 5 बजे से 7 बजे तक 52 गोमाताओं का पूजन किया गया। राजकुमार सराफ, श्रवण बजाज, अरुण पाटोदिया, हरि कानोडिया, जनक कांची, नन्दलाल उपाध्याय, रामरतन भूतड़ा, कमल मस्करा सहित 108 जोड़ों ने विधि विधान से गो माता का पूजन किया। गोमाता के अंगों में विराजित देवताओं का पूजन कर गोमाता के 1008 नाम से गोग्रास के रूप में आहुति दी गई।

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