ब्रिटिश काल की गोल्डन टेम्पल मेल में लगेंगे एलएचबी कोच

- एक सितम्बर 1928 में शुरू हुई थी, सबसे अधिक लम्बी दूरी की ट्रेन ने पूरे किए 92 वर्ष

By: Sanjeev Kumar Singh

Published: 02 Sep 2020, 10:27 PM IST

सूरत.

भारतीय रेलवे की सबसे पुरानी लम्बी दूरी की मुम्बई से अमृतसर के बीच चलने वाली 12903 गोल्डन टेम्पल मेल ने एक सितम्बर को 92 साल पूरे कर लिए हैं। अब पश्चिम रेलवे ने इस ट्रेन के परंपरागत आइएफसी कोचों को एलएचबी कोचों से बदलने का निर्णय किया है। यह व्यवस्था शुरू की गई नॉन एसी स्पेशल ट्रेन में मुम्बई से 15 सितम्बर तथा अमृतसर से 17 सितम्बर से लागू होगी।

कोरोना की रोकथाम के लिए रेलवे के नियमित ट्रेनों का परिचालन बंद है। हाल में राजधानी और नॉन एसी स्पेशल ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है। रेलवे ने नियमित ट्रेनों के नम्बर में बदलाव कर उन्हीं ट्रेनों को विशेष ट्रेन बनाकर चला रही है। इसमें 12903 मुम्बई-अमृतसर गोल्डन टेम्पल मेल भी शामिल है। हाल में जो ट्रेन चल रही है उसका नम्बर 02903/02904 मुम्बई-अमृतसर विशेष ट्रेन है।

सूत्रों ने बताया कि इस ट्रेन में आइएफसी के कुल 24 कोच लगाए जाते थे, लेकिन अब इस ट्रेन के रैक को एलएचबी में बदलने का निर्णय किया गया है। मुम्बई से 15 सितम्बर तथा अमृतसर से 17 सितम्बर से यह व्यवस्था लागू होगी। अधिकारियों ने बताया कि एलएचबी रैक में सीटों की क्षमता बढ़ जाती है। इसलिए इसके 24 कोचों को घटाकर 22 कोच की ट्रेन चलाने की व्यवस्था की गई है। इसमें प्रथम एसी के एक, द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित शयनयान के दो, तृतीय श्रेणी वातानुकूलित शयनयान के पांच, द्वितीय श्रेणी शयनयान के 8, जनरल कोच के दो समेत कुल 22 कोच लगाए जाएंगे।

ब्रिटिश काल की गोल्डन टेम्पल मेल में लगेंगे एलएचबी कोच

पेशावर तक जाती थी

ब्रिटिश हुकूमत में वर्ष 1928 में फ्रंटियर मेल (गोल्डन टेम्पल मेल) ने सफर की शुरूआत की थी। यह ट्रेन बॉलार्ड पियर मोल स्टेशन से दिल्ली, बठिंडा, फिरोजपुर, लाहौर होते हुए पेशावर तक जाती थी। लेकिन एक मार्च 1930 से यह सहारनपुर, अंबाला, अमृतसर होते हुए पेशावर जाने लगी थी। 1947 में भारत विभाजन के बाद इस ट्रेन का टर्मिनल स्टेशन अमृतसर बनाया गया। फ्रंटियर मेल को औपचारिक रूप से सितम्बर 1996 में गोल्डन टेम्पल मेल का नाम दिया गया।

भारत की यह पहली ट्रेन थी जिसमें 1934 में वातानुकूलित कोच लगाया गया था। उन दिनों वातानुकूलित प्रणाली में बर्फ की सिल्लयां कोच के नीचे बने ब्लॉक में रखकर, एक बैटरी संचालित ब्लोअर द्वारा हवा किया जाता था जिससे पूरे कोच में ठंडक का अनुभव होता था। इस ट्रेन में पेंट्रीकार की सुविधा थी जो वर्तमान में भी उपलब्ध है।

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Sanjeev Kumar Singh Reporting
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