लम्बी-चौड़ी फौज, जानते होंगे कम

भाजपा के अभेद्य गढ़ सूरत में प्रत्याशी तक मूल सूरती नहीं था

By: Dinesh Bhardwaj

Published: 04 Apr 2019, 06:36 PM IST

सूरत. आज जो सूरत में भाजपा में कार्यकर्ताओं की लंबी-चौड़ी फौज है, उनमें से शायद 5 फीसदी भी यह नही जानते कि कुछ दशक पहले इस विचारधारा को मानने वाले लोग और कार्यकर्ता नाममात्र ही थे। इतना ही नही आज की सबसे धनी और दस करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ताओ की पार्टी भाजपा और उसके मूल संगठन जनसंघ के पास चुनाव लडऩे के लिए ना ही तो नेता और ना ही पैसा था। कांग्रेस के अभेद्य गढ़ सूरत लोकसभा में जनसंघ से चुनाव लडऩे की पहली हिम्मत भी प्रवासी कार्यकर्ता ने ही दिखाई, हालांकि इसके बाद कददावर नेता के रूप में भाजपा को काशीराम राणा मिल गए थे।
गुजरात में भाजपा के अभेद्य गढ़ सूरत का पिछला राजनीतिक इतिहास खंगाले तो जानेंगे कि चार दशक पहले यहां भाजपा या जनसंघ की स्थिति बड़ी विकट थी। इसे सिलसिलेवार जानें तो 1952 में देश के पहले लोकसभा चुनाव में सूरत संसदीय सीट से पहले निर्वाचित सांसद बनने का मौका कांग्रेस के कन्हैयालाल देसाई को मिला। देसाई अगले आम चुनाव 1957 में भी क्षेत्र का बतौर सांसद दिल्ली में प्रतिनिधित्व किए। कन्हैयालाल देसाई के बाद सूरत लोकसभा सीट के सांसद बनने का गौरव पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को मिला और ये 1962 से 1977 तक लगातार 5 बार सांसद रहे। हालांकि बीच मे इनकी पार्टी कांग्रेस से बदलकर जनता पार्टी हो गई। 77 के बाद 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जनता पार्टी के अशोक मेहता को हराकर इस सीट पर फिर से पार्टी का कब्जा जमवाया और कददावर नेता सीडी पटेल लगातार दो टर्म सांसद रहे। उधर, भारतीय जनसंघ की विचारधारा से निकलकर 6 अप्रेल 1980 को भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई और भाजपा से पहले प्रत्याशी के रूप में काशीराम राणा ने 1984 में लोकसभा चुनाव लड़ा और हार का सामना भी करना पड़ा, मगर इसके बाद भाजपा ने फिर कभी सूरत लोकसभा सीट से मुंह की नही खाई और 1989 से आज तक लगातार जीतती आ रही है। इन 30 वर्षों की अपराजेय पारी में काशीराम राणा छह बार लगातार सांसद बने व दो बार केंद्रीय मंत्री का दायित्व भी निभाए। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराजगी की वजह से 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी टिकट काट दी गई और दर्शना जरदोष को चुनाव लडऩे का मौका मिला और वे दो टर्म सांसद रहने के बाद तीसरी बार पार्टी प्रत्याशी के रूप में 2019 के 17वें लोकसभा के लिए चुनाव लड़ रही है।


तब थे ये मात्र सात


1984 से भाजपा सूरत संसदीय क्षेत्र में चुनाव लड़ रही है लेकिन इससे पूर्व इसकी नीव जिन हालात में यहां रखी गई वो बड़ी दिलचस्प है। 1967 के लोकसभा चुनाव में पहली बार जनसंघ ने इस सीट पर चुनाव ल?ने की हिम्मत दिखाई, हालांकि तब उनके पास कार्यकर्ता और नेता के नाम पर गिने-चुने ही लोग थे। कांग्रेस के दिग्गज नेता मोरारजी देसाई के खिलाफ चुनाव लडऩे का दुस्साहस तत्कालीन जनसंघ के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष मंगलसेन चौपड़ा ने दिखाया। चौपड़ा मूल गुजराती या सुरती भी नही थे। इस सम्बंध में गुजरात के पूर्व मंत्री आत्माराम परमार बताते है कि तब सूरत लोकसभा काफी बड़ा क्षेत्र था। ओलपाड, बारडोली, अंकलेश्वर, नवसारी आदि तक जनसंघ प्रत्याशी व कार्यकर्ता साइकिल पर प्रचार करते। उस दौरान सक्रिय कार्यकर्ता या नेता के तौर पर मंगलसेन चौपड़ा के अलावा काशीराम राणा, वसन्त देसाई, सुनील मोदी, चंपक सुखडिय़ा, फकीर चौहान आदि जनसंघ जिंदाबाद के नारे लगाते सूरत की सड़कों व गलियों में दिखते थे। 1967 का चुनाव भले ही जनसंघ हार गया लेकिन एक अलग विचारधारा के बीज अवश्य यहां रोप दिए गए।


बोटाद बनी थी पहली नगरपालिका


1967 में जनसंघ भले ही सूरत लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हार गई लेकिन उसी दौरान मोरारजी देसाई व इंदिरा गांधी के संबंधों में भी खटास आ गई और 1969 में मोरारजी ने इंदिरा के खिलाफ मोर्चेबंदी करते हुए इंडिकेट वर्सेज सिंडीकेट बना डाला। इस सिंडीकेट में समता कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, जनता दल के अलावा जनसंघ भी शामिल हो गया और तब से गुजरात में जनसंघ की राजनीतिक स्थिति में सुधार होता गया। इसी दौर में पहली बार जनसंघ ने गुजरात में बोटाद नगरपालिका का चुनाव जीता और वहां बोर्ड बनाया। उस दौर में सूरत के जनसंघियों ने पूरे गुजरात में जमकर मेहनत की थी हालांकि परिणाम बोटाद नगरपालिका का ही पक्ष में आया। बातचीत में पूर्व मंत्री परमार ने यह भी बताया कि आज भले ही भाजपा काफी मजबूत स्थिति में सूरत समेत गुजरातभर में है लेकिन तब जनसंघियों को जनसम्पर्क के दौरान भी बड़ी पीड़ा झेलनी पड़ती थी। प्रचार के दौरान लोग घरों के दरवाजे नहीं खोलते और खोलते भी तो गांधीजी के हत्यारे का समर्थक बोलकर वापस दरवाजे बंद कर लेते थे।

Dinesh Bhardwaj Reporting
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