ऐसे दिन कभी ना दिखाए भगवान

मुंबई से साइकिल पर आ रहे युवकों को सूरत से बस में बिठाकर भिजवाया

By: Dinesh Bhardwaj

Updated: 10 May 2020, 08:39 PM IST

सूरत. मजबूरी थी साहब जो दस साल बाद साइकिल उठाई और पैडल लगाए, लेकिन वो भी कहां तक। मुंबई से नवसारी आते-आते बस जान ही नहीं निकली और वो भी शायद इसलिए कि दो साथियों को घर पहुंचाने का वादा किया था। तभी शायद सूरत में भगवान ने हमारी आगे जाने की व्यवस्था कर दी पर ऐसे दिन भगवान कभी ना दिखाए। यह बात फोन पर बताते हुए पाली के लुणावा गांव का गणेश चौधरी फफक कर रो पड़ा।
मुंबई के मुंब्रा क्षेत्र में कटलरी शॉप के कर्मचारी गणेश ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान वे 42 दिन तो मुंबई में जैसे-तैसे रह लिए और जब किसी भी तरीके से पाली के लिए वाहन की व्यवस्था नहीं हो पाई तो पड़ोसी दुकानदार से 10 हजार रुपए उधार में दो साइकिलें खरीदी और साथी सुरेश चौधरी व प्रकाश कुम्हार के साथ राजस्थान के लिए निकल पड़े। साइकिल के हाथ दस साल बाद लगाए थे तो आखिर कब तक चलाते और बीच में टोलनाके पर मौजूद पुलिस से बचने के लिए जंगल में कई किमी अलग से चलना पड़ा वो अलग। साइकिल उठाकर नहर भी पार की और भिलाड़ चेकपोस्ट पर एक भले ट्रकचालक ने बॉर्डर पार करवा दी। मगर वापी, वलसाड और नवसारी आते-आते ढेर हो गए। यहां पर किसी परिचित के माध्यम से श्रीखेतेश्वर पैदल यात्रा संघ के संयोजक महेंद्रसिंह राजपुरोहित से सम्पर्क हुआ और उन्होंने कड़ोदरा चौराहे तक आने की बात कही। इस बीच उन्होंने पहचान-पत्र मंगवाया और पहले पाली के लिए बस की कोशिश की और नहीं होने पर उदयपुर की बस में व्यवस्था करवाई। न्यू ब्रांड साइकिलें भी कड़ोदरा में ही उन्होंने सुरक्षित रखवाई और हम तीनों को भोजन-पानी के बाद बस में बिठाकर रवाना किया। मगर दिक्कतें यहीं खत्म नहीं होनी थी। उस बस से उदयपुर उतरने के बाद हमें वहां से पैदल सौ किमी चलकर चारभुजा जाना पड़ा और वहां से टैक्सी मिलने पर देसूरी के निकट गांव लुणावा व दुजावा पहुंचने को मिला। अभी फिलहाल स्कूल में क्वारंटाइन है, लेकिन खुशी है परिजनों के साथ है। बस भगवान ऐसे दिन कभी नहीं दिखाए और जिन्हें हम जानते तक नहीं ऐसे मददगारों का भी खूब-खूब धन्यवाद।

Dinesh Bhardwaj Reporting
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