हमारा जुनून धोनी-कोहली की तरह, पहचानता कोई नहीं

शारजाह में पाकिस्तान को परास्त कर विश्व खिताब पर कब्जा बरकरार करने वाली टीम इंडिया (ब्लाइंड क्रिकेट) के खिलाडिय़ों देश आने पर जज्बा विराट कोहली और धोनी

By: मुकेश शर्मा

Published: 26 Jan 2018, 05:04 AM IST

सूरत।शारजाह में पाकिस्तान को परास्त कर विश्व खिताब पर कब्जा बरकरार करने वाली टीम इंडिया (ब्लाइंड क्रिकेट) के खिलाडिय़ों देश आने पर जज्बा विराट कोहली और धोनी से कम नहीं दिखा। क्योंकि इनको भी जीतने की आदत है।

तभी तो बीते ५९ महीनों में इन्होंने एकदिवसीय मैचों के दो विश्व कप, दो टी-२० वल्र्ड कप, एशिया कप और चार द्विपक्षीय शृंखलाओं को जीता। लेकिन, दुर्भाग्य है कि जिस देश में क्रिकेट ‘धर्म’ की तरह माना जाता है और क्रिकेट खिलाड़ी स्टार वहां इनको पहचान तक नहीं मिल पाई। हाल यह है कि टीम के १७ खिलाडिय़ों में से १२ के पास तो स्थायी रोजगार तक नहीं है। इनमें तीन दक्षिण गुजरात से हैं, जो बड़े संघर्ष में जिन्दगी गुजार रहे हैं।


विश्व चैम्पियन बनने के बाद ये खिलाड़ी गुरुवार रात को सूरत एयरपोर्ट पर उतरे तो स्वागत करने वालों में इनके अपने ही लोग ज्यादा थे। इस अवसर पर नवसारी सांसद सी.आर. पाटिल भी मौजूद थे।

सरकारी आश्वासन में ***** गया दो विश्वकप जीतने वाला

टीम में बतौर आलराउंडर खेल रहे वलसाड जिले के गणेश महुडक़र भारतीय ब्लाइंड क्रिकेट टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सेमीफाइनल में बांग्लादेश के खिलाफ शानदार प्रदर्शन कर मैन ऑफ द मैच भी रहे। देश के लिए दो विश्वकप जीतने वाली टीम के अहम सदस्य रहे गणेश को २०१४ में विश्वकप जीत के बाद गुजरात सरकार ने नौकरी देने का वादा किया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। तभी तो गणेश के माता-पिता वलसाड के एक फार्म पर मजदूरी करते हैं तो वह खुद की छोटी सी किराना दुकान चलाता है।

गणेश ने बताया, परिवार हमेशा मुझे क्रिकेट खेलने से रोकता है, पर यह मेरा जुनून है। राजपुरी गांव के रहने वाले गणेश को बचपन में साइकिल से गिरने के कारण गंभीर चोट लगी और उपचार में लापरवाही के बाद आंखों की रोशनी चली गई।

दूध बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं

वलसाड़ जिले के ही उकता गांव का रहने वाला अनिल आर्य (गारिया) भी टीम इंडिया में बतौर हरफनमौला खेलता है। परिवार में आठ सदस्य हैं, जिनका गुजारा १२ हजार रुपए प्रतिमाह में चलता है। पिता खेत में श्रमिक है और वह घर-घर दूध बांटता है। खेलने के लिए बाहर जाता है तो किसी और को दूध बांटने का जिम्मा सौंपकर जाता है। मैच खेलने से पहले या बाद में फोन करके पूछता भी है कि सब ठीक चल रहा है या नहीं। इससे खेलते समय उसका ध्यान भंग होता है। अनिल दो साल का था जब सिर में चोट लगने के बाद आंखों की रोशनी चली गई।


बीसीसीआई से सम्बद्ध नहीं सीएबीआई

क्रिकेट एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड इन इंडिया (सीएबीआई) दुनिया के सबसे अमीर खेल बोर्ड बीसीसीआई से सम्बद्ध नहीं है, इसके चलते उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं मिल पाती। सिर्फ सरकार से थोड़ी बहुत मदद मिलती है। अभ्यास और खेल के लिए मैदान भी बड़ी मुश्किल से उपलब्ध हो पाता है। यह पीड़ा ब्लाइंड टीम के राष्ट्रीय कोच जॉन डेविड भी जता चुके हैं।


खेती के भरोसे परिवार

नवसारी जिले में वांसदा क्षेत्र के खाटाआंबा गांव का नरेश तुमवाड़ी भारतीय टीम का अहम हिस्सा है, लेकिन क्रिकेट का शौक दिनभर खेत में पसीना बहाने के बाद पूरा हो पाता है। पेशे से किसान नरेश पांच साल का था जब जहरीली वनस्पति के सम्पर्क में आने के बाद आंखों की रोशनी चली गई। नरेश को परिवार और गांव के लोग अनिल के नाम से भी जानते हैं। वह लंबी कूद के भी अच्छे खिलाड़ी हैं।


मुकेश त्रिवेदी/हेमंत डेरे

 

मुकेश शर्मा Reporting
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