SPECAIL NEWS: हाथ में कटोरे की जगह किताब पकड़ाने का इसमें है ‘जिगर’

15-15 दिन नहाते तक नहीं ऐसे बच्चों को शिक्षित बनाने के लिए निकल पड़ा यह युवक

अभी तक छह बच्चों को मनपा संचालित स्कूल में प्रवेश भी मिल गया

 

सूरत. सडक़ किनारे कटोरे में भीख मांगते एक-दो नहीं बल्कि 50-60 बच्चों के हाथों में ज्ञान की पुस्तकें पकड़ाने वाले का संघर्ष भी कुछ कम नहीं रहा होगा। ऐसे संघर्षशील युवा जिगर का जिगर भी कम नहीं जो डेढ़ बरस के संघर्ष में ही कच्ची बस्ती के भिक्षाटन करने वाले बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगा दी। 15-15 दिन तक नहीं नहाने वाले इन बच्चों को आत्मसम्मान से जीने की सीख देना ही इस युवक ने लक्ष्य बना रखा है और अभी तक छह बच्चों को मनपा संचालित स्कूल में प्रवेश भी मिल गया है।
गुजरात की औद्योगिक राजधानी सूरत महानगर में जहां विलासिता और समृद्धि फैली-पसरी है वहीं, यहां कुछ ऐसी जगह भी जहां गंदगी, कचरा, टूटी-फूटी झोपड़ी और खेलते-कूदते अधनंगे बच्चे दिखाई दे जाएंगे। यहां बात हो रही है विलासिता के प्रतीक अमेजिया वाटरपार्क और उसके ठीक सामने दो वक्त की रोटी का संघर्ष करती झुग्गी-झोपड़ी के वाशिंदों की। वर्षों से इस जगह पर भिक्षाटन करने वाले अथवा छोटा-मोटा काम कर गुजर-बसर करने वाले लोगों की ढाईसौ-तीनसौ टूटी-फूटी झोपडिय़ां है। इन लोगों के बच्चे भी खेलने-कूदने की उम्र में ही हाथ में कटोरा लेकर पेट पालने की जुगत में लग जाते थे और इन्हें भोजन खिलाने वालों के साथ ही डेढ़-पौने दो बरस पहले युवा जिगर रावल भी यहां आया। भोजन लूटने के लिए लड़ते अधनंगे बच्चों को देख उसके मन में इन्हें पढ़ाने व आत्मनिर्भर बनाकर सम्मान के साथ जीने की प्रेरणा जाग गई और फिर शुरू हो गया जिगर का संघर्षभरा शिक्षा अभियान।


एक-दो आए पर हार नहीं मानी


बच्चों को पढ़ाने की नेकनीयत से बस्ती में रोज आने पर भी कुछ समय तक उसे वहां के लोगों का सहयोग नहीं मिला लेकिन खेल-खेल के बहाने एक-दो बच्चे अवश्य जुटने लगे और यहीं से राजस्थान के मूल सिरोही निवासी जिगर रावल के हौसले बुलंद हो गए। उसने हार नहीं मानी और एक-दो से कुछ ही समय में बच्चों की संख्या बढ़ गई और फिर बस्ती के ही रोहित, ललित जैसे युवक उसके साथ खड़े हो गए। चलो किसी और के लिए जीते है...स्माइल एंड हैप्पीनेस...टेगलाइन की इस अनूठी पाठशाला में आज 5-60 बच्चे पढ़ते है।


उषा-राजेश है यहां वैकल्पिक टीचर


जिगर ने बताया कि वो कपड़ा बाजार में नौकरी करता है और इन बच्चों को भिक्षाटन करने के बजाय प्राथमिक स्तर पर शिक्षित कर स्कूल भेजना ही लक्ष्य बना रखा है। बीते डेढ़ वर्ष में उसने आंशिक सफलता भी हासिल की है और मगोब प्राथमिक स्कूल में इस पाठशाला के छह बच्चों को इसी साल प्रवेश मिला है। यहां पर उसकी अनुपस्थिति में बस्ती के नौ साल की उषा व सात साल का राजेश टीचर बनकर बच्चों एबीसीडी, ककहरा, गिनती आदि सिखाते है। बस्ती के युवा भी उसके इस अभियान में अब खुलकर सहयोगी बन चुके है।


15-15 दिन तक नहीं नहाते


अमेजिया वाटरपार्क तो शहर में सब जानते है मगर उसके ठीक सामने इस बस्ती में घुसने की हिम्मत भी शायद लोग यहां पसरी गंदगी और उसमें मुंह मारते सुअर, टूटी-फूटी झोपड़ी में रहते लोगों को देख नहीं कर पाए। यहां के लोग खुले में शौच के लिए तो मजबूर है ही वहीं बच्चे नहर में पानी आने पर ही नहाते है और नहर में पानी 15-15 दिन से आता है। इन बच्चों के गंदे रहने से ही जिगर को इनका स्कूल में प्रवेश कराने में बड़ी दिक्कत आती है, अन्यथा बस्ती के डेढ़ दर्जन बच्चे इतना कुछ सीख चुके है कि वे प्राथमिक शाला में प्रवेश पा जाए।


पर्यावरण का सीख रहे सबक


जिगर के हौसले तब और मजबूत हो गए जब उसके साथ शहर के पर्यावरण प्रेमी तुलसी रावल भी जुड़ गए। तुलसीभाई भी अब इन बच्चों के बीच पेड़-पौधों के रखरखाव के माध्यम से पर्यावरण की सीख उन्हें देने लगे है। वे बताते हैं कि यह अभी कोमल मन के बच्चे है और इन्हें जो सीख दी जाएगी उसे वे जिंदगीभर साथ लेकर चलेंगे। उधर, जिगर बताता है कि वे एक से भले दो हो गए तो अब उसकी हिम्मत बढ़ गई है और अन्य सेवाभावी लोगों का भी यहां अब आना-जाना होने लगा है, जिससे लगता है कि मेहनत का रंग आने लगा है।

Dinesh Bhardwaj
और पढ़े
खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned