इधर भी ध्यान दे स्टार्ट अप वाली सरकार

गुजरात के अधिकांश इलाकों में तो ट्रिपल इंजन सरकार

By: विनीत शर्मा

Updated: 07 Mar 2020, 06:11 PM IST

विनीत शर्मा

सूरत. जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव के कारण एक ओर आयुर्वेद की पुरानी परंपरा में जड़ी-बूटियां विलुप्त होने के कगार पर हैं, तो दूसरी ओर इन जड़ी-बूटियों के जानकार सरकारी उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। शिक्षित तबका भी वेदू भगतों और झोलाछाप डॉक्टरों के बीच का फर्क समझ पाने में खुद को अक्षम पा रहा है। ऐसे में करामाती जड़ी-बूटियों के साथ ही इनके जानकार भी लगातार कम हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशभर में डबल इंजन सरकार के फायदे समझा रहे हैं और गुजरात के अधिकांश इलाकों में तो ट्रिपल इंजन सरकार है। यानी स्थानीय स्तर पर भी पंचायतों, नगर पालिकाओं और महानगर पालिकाओं में भाजपा की सरकार है। इसके बावजूद इनके हित में काम करने का जज्बा किसी स्तर पर नहीं दिख रहा।

स्टार्टअप वाली सरकार पिछड़े इलाकों और दूर-दराज के गांवों में आयुर्वेद की परंपरा को जीवित रख रहे वेदू भगतों के लिए नीति नहीं बना पाई है।
डांग जिले का समूचा क्षेत्र औषधीय वनस्पतियों के लिए देशभर में विशेष पहचान रखता है। इस पर्वतीय क्षेत्र में रह रहे वेदू भगतों के पास औपचारिक स्कूली शिक्षा का भले अभाव हो, लेकिन अनुभव में दक्ष वेदू भगत, किसी भी डिग्रीधारी वैद्य या चिकित्सक को अपनी प्रतिभा के बूते कमतर साबित करने का जज्बा रखते हैं। एलोपैथी में दवाओं के नकारात्मक असर सामने आने के बाद लोगों में जागरूकता आई है और इलाज के लिए होम्योपैथी व आयुर्वेद की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है। इसीलिए जड़ी-बूटियों का औषधीय महत्व बढ़ गया है।

अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति से निराश हो चुके लोगों के लिए आयुर्वेद आखिरी उम्मीद बन गया है। ऐसे में सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी इंटीरियर गांवों तक में वेदू भगत लोगों का उपचार कर रहे हैं। इनकी ख्याति देख दूर-दराज से भी लोग बड़े शहरों का मोह छोड़ इनके पास इलाज के लिए किसी तरह पहुंच ही जाते हैं। इसके बावजूद इनके पास न बैठने की मुकम्मल व्यवस्था है और न आमदनी का ही कोई नियमित जरिया है। इसीलिए वेदू भगतों की नई पीढ़ी से कई लोग दूसरे काम-धंधे तलाशने पर ध्यान दे रहे हैं। वेदू भगतों की घटती संख्या पारंपरिक आयुर्वेदिक इलाज के लिए ही नहीं उन जगहों के लिए भी चिंताजनक है, जहां सरकार इलाज की सहूलियतें पहुंचाने में विफल रही हैं।

यह निराशाजनक है कि स्टार्ट अप वाली सरकार वेदू भगतों को मंच नहीं दे पा रही। वेदू भगतों की व्यथा बताती है कि नई पीढ़ी के लिए पीढिय़ों से चला आ रहे चिकित्सा क्षेत्र में भविष्य सुनहरा नहीं रह गया है। जानकारों के मुताबिक राज्य सरकार और लोकल सरकार चाहें तो इन्हें बेहतर मंच दे सकती हैं। डांग जिले के ग्रामीण इलाकों में यदि जगह-जगह फेसिलिटेशन सेंटर खोल कर वेदू भगतों को वहां बैठने की व्यवस्था की जानी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो बाहर से आने वाले लोगों के लिए भी पुरातन परंपरा से इलाज के बेहतर अवसर मिल जाएंगे। साथ ही दर-दर भटक रहे वेदू भगतों को भी एक मंच मिल जाएगा। उनका मानना है कि सरकार चाहे तो नीति बनाकर इस तरह के सेंटर खोले जा सकते हैं। साथ ही उन्होंने क्षेत्र में लुप्त हो रही जड़ी-बूटियों का एनसाइक्लोपीडिया तैयार करने की जरूरत पर भी बल दिया। इसका लाभ यह होगा कि लुप्त हो रही जड़ी-बूटियों को समय रहते बचाया जा सकेगा।

विनीत शर्मा Reporting
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