TEXTILE CITY: इंडस्ट्री की जरूरत, श्रमिक बगैर आहत

सूरत के अकेले कपड़ा उद्योग में 10 लाख से ज्यादा श्रमिक, फिलहाल 30 से 35 फीसदी लौटे

लॉकडाउन के दौरान जितनी संख्या में श्रमिक ट्रेनें सूरत से चलाई गई थी, उसकी 25 फीसदी ट्रेनें भी अभी रेगूलर नहीं चल पा रही है और नतीजन टैक्सटाइल इंडस्ट्री लेबर के बगैर डिमांड के बावजूद प्रोडक्शन कॉस्ट के लिए मजबूर है

 

By: Dinesh Bhardwaj

Published: 05 Sep 2020, 08:22 PM IST

सूरत. अनलॉक-4.0 में अब जब सब-कुछ धीरे-धीरे सामान्य होने की ओर लौट रहा है तो सिल्कसिटी सूरत के कपड़ा उद्योग समेत अन्य व्यापार-धंधों को श्रमिकों की कमी खलने लगी है। स्थिति यह है कि लॉकडाउन के दौरान जितनी संख्या में श्रमिक ट्रेनें सूरत से चलाई गई थी, उसकी 25 फीसदी ट्रेनें भी अभी रेगूलर नहीं चल पा रही है और नतीजन टैक्सटाइल इंडस्ट्री लेबर के बगैर डिमांड के बावजूद प्रोडक्शन कॉस्ट के लिए मजबूर है।
लॉकडाउन के दौरान कोरोना महामारी से पनपे भय ने अकेले सूरत शहर से 15 लाख से ज्यादा श्रमिकों को गांव-घर लौटने को विवश कर दिया था। उनकी वापसी के लिए केंद्रीय रेल मंत्रालय ने करीब 25 श्रमिक टे्रनों का भी संचालन किया और गांव-घर लौटने वाले श्रमिकों में करीब 10 लाख श्रमिक कपड़ा उद्योग से जुड़े थे। अब छह माह बाद धीरे-धीरे सबकुछ पटरी पर आने लगा है और कपड़ा उद्योग में भी मांग के समक्ष काम निकला है तो उद्यमियों के समक्ष श्रमिक नहीं होने की दिक्कत आ खड़ी हुई है। श्रमिकों को गांव-घर से सूरत बुलाने के लिए यहां के व्यापारी-उद्यमी हरसंभव प्रयास भी कर रहे हैं, उसमें फ्लाइट से टिकट बुकिंग, लग्जरी बसें भेजना और ट्रेनों की टिकट करवाना आदि शामिल है। रेल मंत्रालय की ओर से फिलहाल ट्रेनों का संचालन नाममात्र हो रहा है और उसी का नतीजा है कि सूरत कपड़ा उद्योग श्रमिकों की वापसी का इंतजार कर रहा है।


कहां कितनी संख्या और कितनी है मौजूदगी


यूनिट श्रमिकों की संख्या मौजूदा स्थिति
वीविंग 2 लाख 65 से 70 हजार
प्रोसेस हाउस 1.25लाख 45-50 हजार
वैल्यू एडीशन 1 लाख 35-40 हजार
ट्रेडर्स 70 हजार दुकानें 60 हजार
हैंड वैल्यू 2.50 लाख 70-80 हजार
पार्सल लेबर 50 हजार 15-20 हजार
कटिंग-पैकिंग 50 हजार 15-20 हजार

टिकट बुुकिंग में बड़ी दिक्कत


उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल आदि से जो ट्रेनें फिलहाल चल रही है उनमें भी ऑनलाइन टिकट की बुकिंग में बड़ी दिक्कतें हो रही है और इसकी वजह से श्रमिकों के लिए विंडो टिकट यहां-वहां से बनवाई जा रही है।
बबलू मलिक, प्रमुख, सूरत पार्सल-पैकेजिंग एसोसिएशन

हंड्रेड परशेंट तो तब ही संभव


श्रमिकों की मौजूदगी के बगैर कपड़ा उद्योग के किसी भी सेक्टर में हंड्रेड परशेंट प्रोडक्शन संभव नहीं है। टैक्सटाइल समेत अन्य इंडस्ट्रीज के हित को ध्यान में रख केंद्र सरकार जल्द से जल्द अधिक से अधिक संख्या में ट्रेनें चलाए।
विनय अग्रवाल, कोषाध्यक्ष, सूरत नॉयलोन स्पिनर्स एसोसिएशन


रेगूलर ट्रेनें तो चलाई जाए


लॉकडाउन के दौरान रोजाना 25 श्रमिक ट्रेनें सूरत से चली और अब यूपी-बिहार से आने के लिए 4 ट्रेनें चल रही है। जिस तादाद में श्रमिक सूरत से गांव-घर गए थे, उन्हें वापस लाना है तो अतिरिक्त नहीं लेकिन पुरानी रेगूलर 14-15 ट्रेनें तो रेल मंत्रालय को चलानी ही चाहिए।
हबीब वोरा, सूरत जिला अध्यक्ष, रेलवे पेसेंजर फाउंडेशन डीआरयूसीसी मेम्बर।

Dinesh Bhardwaj Reporting
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