आज फिर बचपन जीने की तमन्ना है..

चाचा नेहरू के जन्मदिवस पर मंगलवार को समूचे देश में बाल अधिकारों, उनकी देखभाल और समान अवसर देने की बड़ी-बड़ी बातें होंगी। बचपन को सुरक्षित और संरक्षित

By: मुकेश शर्मा

Published: 14 Nov 2017, 05:40 AM IST

सूरत।चाचा नेहरू के जन्मदिवस पर मंगलवार को समूचे देश में बाल अधिकारों, उनकी देखभाल और समान अवसर देने की बड़ी-बड़ी बातें होंगी। बचपन को सुरक्षित और संरक्षित करने के पुख्ते दावे होंगे। हर हाल में मौज-मस्ती के बीच जिन्दगी जी रहे बच्चों को उडऩे की आजादी देने के किस्से दोहराए जाएंगे। लेकिन, इन सबके बीच बचपन के उस सच को कौन जानेगा-समझेगा, जो बड़े होने के बाद अनमोल धरोहर या विरासत की तरह यादगार बनकर रह जाता है।

बाल दिवस की पूर्व संध्या पर राजस्थान पत्रिका ने शहर कई लोगों से उनके बचपन को लेकर बात की तो वे आल्हादित हो उठे। उनके पूछे गए सवाल और जवाब के दौरान हुए संवादों में कुछ बातें ऐसी भी सामने आईं, जिन्होंने उनके दिलों को इस कदर छुआ कि वे बोल उठे, उनको जिन्दगी एक और मौका दे तो वे सिर्फ बचपन को जीना चाहते हैं। जो कुछ पीछे छूट गया उसे समेटना चाहते हैं। कागज की कश्ती और बारिश के पानी की मस्ती लेना चाहते हैं।


उम्र से ज्यादा तनाव हो गया बड़ा

लोगों ने बताया कि आज की भाग-दौड़ से भरी जिन्दगी में जीना भला आसान हो गया है, लेकिन जाने-अनजाने तनाव ने इस कदर घेर रखा है कि सुकून कम मिलता है। कम से कम बचपन में यह (तनाव) कोसों दूर रहता है। तब हमारी शरारतों से दूसरों की चिंता बढ़ जाती थी, मगर उम्र के इस पड़ाव पर खुद की उलझनें इस कदर हावी हो गईं कि दूसरों की दर्द-तकलीफों का एहसास तक नहीं हो पाता।

२५ से ५० साल तक के लोगों से की बात

बचपन की यादों को साझा करने के लिए हमने २५ से ५० साल तक के युवाओं, महिलाओं और पुरुषों से बातचीत की। यह उम्र का वह दौर है, जिसमें कॅरियर की चिंता सताने से लेकर, परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करने की मशक्कत और ढलती उम्र पर आने वाले भविष्य का बोझ कंधों पर होता है।

तब सोचते नहीं थे, आज डरते हैं

अपनी जिन्दगी की आधी से ज्यादा पारी खेल चुके कई लोगों के मन में यह कसक है कि छोटे थे तो कुछ भी करने से पहले सोचते नहीं थे। जो मन में आता था उसे पूरा करके ही दम लेते थे। आज कुछ परिवार या खुद के लिए भी कुछ भी करने से पहले डर मन में आ जाता है। अधिकांश मामलों में नकारात्मक सोच ही हावी होती है। कुछ बुरा या गलत हो गया तो....यह डर आगे बढऩे से रोकता है।

इसे गरीब की मजबूरी कहें या समय की मार, पेट की आग सारे सपनों को पलभर में खाक कर देती है। रस्सी पर झूलकर करतब दिखाता यह बचपन यूं ही हिचकोले नहीं खा रहा, बल्कि तमाशबीनों से मिलने वाले पैसों से जिन्दगी का संतुलन बना रहा है। आज बाल दिवस है, बचपन को स्वच्छंतता से जीने का सलीका सिखाने और बताने का दिन। शहर में सब जेल के निकट रिंग रोड पर करतब दिखाता यह बच्चा शायद यही संदेश दे रहा है कि हिम्मत हो तो सारी मुश्किलें पार हो जाती और मेहनत करें तो कभी हार भी नहीं होती।
हेमंत डेरे

आज के दौर में लौटने की ख्वाहिश नहीं

बाल दिवस के अवसर पर पत्रिका ने सौ पाठकों से बचपन से जुड़े सामान्य प्रश्न पूछे। बातचीत के दौरान उनकी अभिव्यक्ति को भी गहराई से समझा। सभी उनके बचपन से जुड़े किस्सों और यादों को बताने के लिए लालायित दिखे। चर्चा के दौरान इतना खो गए कि आज की हकीकत में लौटने का मन किसी का नहीं हुआ।

इन प्रश्नों में उलझे

पहली कविता जो आपको याद है (हिन्दी/अंग्रेजी)
आखरमाला में अ से ज्ञ तक सुनाकर बताएं
पांच बाल फिल्मों के नाम बताएं
छोटे थे तो सबसे पहले क्या बनने का ख्याल आया
मम्मी-पापा से पहली बार कौन-सा झूठ बोला
पहली शरारत जिसने मुसीबत में डाल दिया हो
पहली चोरी जो पकड़ी गई हो या नहीं

 

मुकेश शर्मा Reporting
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