सरकार को क्यों नहीं दिखते हमारे जख्मों से रिसते घाव?


26/11 हमले का शिकार बने मछुआरों के परिजन भोग रहे सरकारी उपेक्षा
आतंकियों के हाथों मारे गए थे नवसारी के तीन मछुआरे

By: Sunil Mishra

Published: 25 Nov 2018, 09:40 PM IST


नवसारी. 26 नवंबर 2008 को मुंबई आतंकी हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों ने आर्थिक नगरी को दहलाने से ठीक पहले नवसारी के तीन मछुआरों को अपनी गोली का निशाना बनाया था। इन मछुआरों के परिजनों के आंसू आज तक नहीं सूखे हैं। दस साल बीतने के बाद भी गुजरात सरकार से उनको उचित सहायता का इंतजार है।

 

 

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आतंकियों ने कुबेर बोट पर मौजूद मछुआरों की हत्या की थी
पाकिस्तान से समुद्री मार्ग से आए आतंकियों ने पोरबंदर की कुबेर बोट पर कब्जे से पहले उस पर मौजूद मछुआरों की हत्या की थी। इसमें नवसारी जिले के जलालपुर तहसील के वासी गांव निवासी नटू नानू राठौड़, मुकेश अंबू राठौड़ और दीवादांडी माछीवाड़ के बलवंत प्रभु टंडेल शामिल थे। मछुआरों को गोली मारकर समुद्र में फेंकने की जानकारी पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब ने दी थी। मामले के जांच दस्तावेजों में भी मछुआरों की हत्या आतंकियों के करने की बात थी। लेकिन गुजरात सरकार ने नवसारी के तीनों मछुआरों की मौत को आतंकवादी हमले में होना, आज तक नहीं माना। हालांकि उस दौरान मछुआरों की हत्या की खबर सामने आने पर राज्य सरकार ने परिजनों को 50 हजार रुपए की मदद थी। साथ ही शर्त भी रख दी थी कि यदि वे जिंदा लौटे तो यह राशि सरकार को वापस कर दी जाएगी। जिले के समाजसेवी इसे शर्मनाक बताते हैं। सरकार ने इन मछुआरों की मृत्यु का प्रमाणपत्र भी नहीं दिया है। दर-दर ठोकर खाने के बाद परिजनों ने सात साल बाद नवसारी कोर्ट में केस दायर किया। कोर्ट के आदेश के बाद मछुआरों की मौत का प्रमाणपत्र तो दिया गया, लेकिन मौत का कारण नहीं बताया गया। सरकार की इस नीति के खिलाफ मछुआरों के परिजनों में काफी नाराजगी है।

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नहीं मिली सहायता राशि
हमले की घटना को दस साल हो चुके हैं, लेकिन मछुआरों के परिजनों को आज तक उचित सरकारी सहायता नहीं मिली है। इनके परिजन हर साल कलक्टर व अन्य अधिकारियों से मिलकर सहायता की मांग करते हैं। संवेदनशील होने का दावा करने वाली सरकार इन परिवारों के प्रति संवेदनशील नहीं हुई है। नटू राठौड़ की विधवा धमिष्ठा साड़ी पर कढ़ाई और लोगों के घरों में काम कर अपना और दो बच्चों का पेट पाल रही है। उसकी यही चाह है कि किसी तरह बच्चे पढ़ लिख कर उसका सहारा बने।

 

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छिन गई बुढ़ापे की लाठी
मुकेश राठौड़ की दादी लक्ष्मी चल भी नहीं पाती हैं और बताती हैं कि मुकेश ही बुढ़ापे की लाठी था। उसके जाने के बाद किसी तरह दिन काट रहे हैं। सरकार से सहायता की उम्मीद पूरी नहीं हुई। कर्ज लेकर किसी तरह उसकी मृत्यु का प्रमाणपत्र बनवाया, लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ। जबकि बलवंत की विधवा दमयंत्री टंडेल ने बताया कि अब तो सरकार से सहायता मांगने में भी शर्म महसूस होती है। हर साल अधिकारियों से मिलते हैं, लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला। पिछले साल बलवंत की मृत्यु प्रमाणपत्र के साथ मत्स्यविभाग में आवेदन दिया था। इसके बावजूद आज तक कोई सहायता नहीं मिली।



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मौत पर भी कर दिया भेदभाव
बलवंत के बेटे उमेश टंडेल का कहना है कि पिता का शव नहीं मिला, इसलिए सरकार कुछ देने को राजी नहीं है। आतंकी कब्जा करने के बाद बोट के कैप्टन अमरसिंह को मुंबई तक ल गए। उन्हें भी वहां पहुंचने के बाद मार दिया था। उनका शव बरामद हुआ था। सरकार ने उनके बेटे को सरकारी नौकरी व सहायता दोनों दी, लेकिन यहां हमारी गुहार सुनने वाला कोई नहीं है।

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