बालक की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए थे महाकाल, दर्शन मात्र से दूर होते हैं सारे कष्ट

कहा जाता है कि एक छोटे से बालक की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव यहां महाकाल के रूप में अवतरित हुए थे

By: सुनील शर्मा

Published: 12 Feb 2017, 11:47 AM IST

उज्जयिनी के आराध्य महाकाल द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक माने जाते हैं। कहा जाता है कि एक छोटे से बालक की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव यहां महाकाल के रूप में अवतरित हुए थे। महाकाल के साथ ही रामभक्त हनुमान भी प्रकट हुए थे और वहां मौजूद सभी लोगों को बालक की तपस्या और चमत्कार के बारे में बताया था।

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ये हैं कथा

उज्जयिनी  में राजा चंद्रसेन का राज था। भगवान शिव के परम भक्त राजा चंद्रसेन को उसके मित्र मणिभद्र ने एक अत्यंत तेजोमय 'चिंतामणि' उपहार में दी थी। इसकी मणि के प्रभाव से चंद्रसेन की दूर-दूर तक कीर्ति बढ़ने लगी। इस पर अन्य राजाओं ने उसे प्राप्त करने की इच्छा जाहिर की। परन्तु राजा ने किसी भी अन्य को मणि देने से इनकार कर दिया जिस पर अन्य राजाओं ने मिल कर चंद्रसेन पर हमला कर दिया।

राज्य पर संकट देख राजा चंद्रसेन अपने आराध्य देव भगवान शिव की शरण में जाकर ध्यानमग्न हो गया। उसी समय वहां एक गोपी अपने छोटे बालक को साथ लेकर दर्शन करने आई। राजा को समाधि में देख बालक भी शिव की पूजा के लिए प्रेरित हुआ। कहीं से एक पाषाण लाकर उसने अपने घर पर ही भक्तिभाव से उस उसे शिवलिंग मान पूजा आरंभ कर दी।

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थोड़ी देर बाद उसकी मां ने उसे भोजन के लिए आवाज दी, लेकिन बालक गहन ध्यान में होने के कारण नहीं सुन पाया। तब माता ने क्रुद्ध होकर बालक को पीटना शुरु कर दिया और पूजा की सामग्री उठा कर फेंक दी। आवाज से बालक का ध्यान टूटा तो उसे अपनी पूजा नष्ट देखकर बहुत दुख हुआ लेकिन उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं वहां एक दिव्य शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए। बालक द्वारा की गई पूजा भी सुसज्जित थी। तभी से महाकाल वहां शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं और अपने भक्तों के कष्ट हरते हैं।

यह घटना देख बालक की मां दंग रह गई। जल्दी ही इस चमत्कार की सूचना पूरे राज्य में होते हुए राजा तक भी पहुंती। राजा चन्द्रसेन स्वयं उस बालक से मिलने पहुंचा। अन्य राजा जो चंद्रसेन से मणि हेतु युद्ध करने आए थे, वे भी बालक के चमत्कार को देख अपने किए की माफी मांगने लगे। उसी समय वहां रामभक्त हनुमानजी भी वहां पहुंचे और उन्होंने बालक को आशीर्वाद देते हुए कहा-

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ऋते शिवं नान्यतमा गतिरस्ति शरीरिणाम्‌॥ एवं गोप सुतो दिष्टया शिवपूजां विलोक्य च॥ अमन्त्रेणापि सम्पूज्य शिवं शिवम्‌ वाप्तवान्‌। एष भक्तवरः शम्भोर्गोपानां कीर्तिवर्द्धनः इह भुक्तवा खिलान्‌ भोगानन्ते मोक्षमवाप्स्यति॥ अस्य वंशेऽष्टमभावी नंदो नाम महायशाः। प्राप्स्यते तस्यस पुत्रत्वं कृष्णो नारायणः स्वयम्‌॥

अर्थात 'शिव के अतिरिक्त प्राणियों की कोई गति नहीं है। इस गोप बालक ने अन्यत्र शिव पूजा को मात्र देखकर ही, बिना किसी मंत्र अथवा विधि-विधान के शिव आराधना कर शिवत्व-सर्वविध, मंगल को प्राप्त किया है। यह शिव का परम श्रेष्ठ भक्त समस्त गोपजनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इस लोक में यह अखिल अनंत सुखों को प्राप्त करेगा व मृत्योपरांत मोक्ष को प्राप्त होगा। इसी के वंश का आठवाँ पुरुष महायशस्वी 'नंद' होगा जिसके पुत्र के रूप में स्वयं नारायण 'कृष्ण' नाम से प्रतिष्ठित होंगे।
सुनील शर्मा
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