दशलक्षण पर्व पर बताया दया धर्म का मूल है, विमल है, सर्वजीवों का हितकारक है

दशलक्षण पर्व पर बताया दया धर्म का मूल है, विमल है, सर्वजीवों का हितकारक है

Akhilesh Lodhi | Publish: Sep, 16 2018 01:00:38 PM (IST) Tikamgarh, Madhya Pradesh, India

शहर की ह्रदय स्थली नंदीश्वर कॉलोनी में दशलक्षण पावन पर्व के अवसर पर पूजन शिविर का आयोजन किया जा रहा है

टीकमगढ़.शहर की ह्रदय स्थली नंदीश्वर कॉलोनी में दशलक्षण पावन पर्व के अवसर पर पूजन शिविर का आयोजन किया जा रहा है। संगीत की भव्य स्वर लहरी के साथ श्रीजी का अभिषेक पूजन किया गया है। धार्मिक कार्यक्रम में जैन समाज के लोग शामिल हो रहे है। जैन समाज के कार्यक्रम में कहा कि मान का मर्दन करने वाला है, दया धर्म का मूल है, विमल है, सर्वजीवों का हितकारक है और गुण गणों में सारभूत है। इस मार्दव धर्म से ही सकल व्रत और संयम सफ ल होते हैं। मार्दव धर्म मान कषाय को दूर करता है। मार्दव धर्म पांच इंद्रिय और मन का निग्रह करता है। चित्तरूपी पृथ्वी के आश्रय से करुणारूपी नूतन बेल मार्दवरूपी धर्म पर फैल जाती है। आचार्य कुंदकुंद स्वामी ने कहा कि जब तक हम अपने मान का त्याग नहीं करेंगे, तब तक हम मोक्ष के रास्ते पर नहीं जा सकते, हमें मोक्ष मार्ग पर जाने के लिए मान का त्याग करना होगा। तभी सच्चा मार्दव धर्म कहलाएगा। पंडित सुनील कुमार शास्त्री ने पूजन के दौरान भक्तों को समझाया कि व्यक्ति को किसी भी प्रकार का अभिमान नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें ना तो अपने धन वैभव संपत्ति का अभिमान करना चाहिए ना ही हमें अपने शरीर का अभिमान करना चाहिए। शनिवार दशलक्षण पर्व का दूसरा दिन मार्दव धर्म यही मार्दव धर्म का सच्चा सार है। मार्दव धर्म से जिनशासन का ज्ञान होता है और अपने और पर के स्वरूप की भावना भायी जाती है। मार्दव सभी दोषों का निवारण करता है और यह मार्दव ही जीवों को जन्म समुद्र से पार कराने वाला है। यह मार्दव परिणाम, सम्यग्दर्शन का अंग है ऐसा जानकर है भव्य। तुम विचित्र और अमल इस मार्दव धर्म की सदा स्तुति करो। जाति आदि मदों के आवेश वश होने वाले अभिमान का अभाव करना मार्दव है। मार्दव का अर्थ है मान का नाश करना। मृदु का भाव मार्दव है, यह मार्दव मानशत्रु का मर्दन करने वाला है। यह आठ प्रकार के मद से रहित है और चार प्रकार की विनय से संयुक्त है। देखो इंद्र नाम का विद्याधर इंद्र के समान वैभवशाली था। फि र भी रावण के द्वारा पराजय को प्राप्त हुआ है । वह रावण भी एक दिन मान के वश में नष्ट हो गया। इस संसार में मान किसका करना, जहां पर प्राणी राजा होकर विश्षा में कीड़ा हो गया।


विद्याधर की श्रेणी में आता था रथनूपुर
विद्याधर की श्रेणी पर रथनूपुर नगर में राजा सहस्रार की रानी मानस सुंदरी के गर्भ में पुण्यशाली बालक के आने से उसे इंद्र की संपदा भोगने की इच्छा हुई। राजा ने रानी का दोहला पूर्ण किया पुत्र का जन्म होने पर उसका नाम इंद रखा। इंद्र ने तरुण होकर अपने वैभव को इंद्र सदृश बनाया। उसके 48 हजार रानियां थीं। 26 हजार नृत्यकार थे, ऐरावत नाम का हाथी था,पट्रानी का नाम शची, चारों दिशाओं में चार लोकपाल, सुधर्मा सभा। रावण जब दिग्विजय के लिए निकला तब उसने इंद्र विद्याधर को जीतकर बांध लिया। उधर इंद्रजीत ने इंद्र के पुत्र जयंत को बांध लिया। इंद्र घड़ा लेकर पृथ्वी को सिंचित करे और उसकी रानियां रांगोली बनावें।

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