8 माह की गर्भवती 250 किलोमीटर पैदल चलकर सात दिन बाद पहुंची अपने घर

- रास्ते में केवल 3 दिन मिला खाना, बिस्किट-चना और कच्चे दानों से कटा सफर

- ग्वालियर से टीकमगढ़ तक किसी तरह नहीं मिली मदद

By: Tanvi

Updated: 23 Apr 2020, 11:00 AM IST

टीकमगढ़/ कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के इस दौर में सबसे अधिक झकझोर देने वाली कहानी निवाड़ी जिले के पृथ्वीपुर ब्लॉक अंतर्गत अजनौर निवासी सुखवती आदिवासी की आई है। आठ माह की गर्भवती इस महिला ने पति, तीन संतान और अपने चार अन्य साथियों के साथ ग्वालियर से भी आगे से 250 किलोमीटर पैदल चलकर 7 दिन बाद अपने घर पहुंची। इस दौरान उसे पेट में दर्द हुआ और पांव में सूज गया, पर हौसला नहीं हारा। सुखवती कहती है कि इतना खतरा उठाकर अगर घर नहीं लौटते तो परिवार सहित भूखे मर जाते। गांव पहुंचने के बाद सुखवती व अन्य लोगों की स्क्रीनिंग कराकर क्वारेंटाइन करा दिया गया है।

 

दरअसल, अजनौर के ये आदिवासी परिवार होली का त्योहार खत्म होते ही ग्वालियर के आगे देहली सिसौद सरसो की कटाई के लिए गए थे। वहां, 14 दिन ही काम कर पाए थे कि कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन कर दिया गया। किसानों ने उनकी मदद की और मजदूरी के पैसे भी दे दिए, इसलिए सभी यह सोचकर वहां रुक गए कि 14 अप्रेल तक की ही तो बात है। सुखवती ने बताया कि दूसरी बार लॉकडाउन बढ़ाए जाने से उनकी हिम्मत टूट गई। पास पैसे भी नहीं बचे और किसान भी मदद से पीछे हटने लगे। उसके सहित तीन परिवार साथ थे। सभी को चिंता उसके कोख में पल रहे आठ माह के बच्चे को लेकर थी। तमाम प्रयास के बाद भी जब किसी तरह के साधन की व्यवस्था नहीं हुई तो वह हिम्मत करके देहली सिसौद गांव से 15 अप्रेल को पैदल चल पड़ी। पति व साथियों को उम्मीद थी कि रास्ते में कुछ न कुछ मिल ही जाएगा।

 

कहीं नहीं मिली मदद

सुखवती ने बताया कि देहली सिसौद से 20 किलोमीटर पैदल चलकर वह सब ग्वालियर पहुंचे। रास्ते में मिले पुलिसकर्मियों व अन्य लोगों से मदद मांगी। पर किसी ने भी उसकी हालत पर रहम नहीं की। उसने बताया कि 250 किलोमीटर के इस पैदल सफर में तीन जगहों पर उसके साथियों ने मदद के लिए हाथ फैलाया पर तिरस्कार ही मिला। एक जगह तो यहां तक कहा गया कि जहां से आ रहे हो वहीं लौट जाओ। घर छोड़कर जाने से पहले प्रशासन से अनुमति ली थी क्या। उनके साथ उसके तीन बच्चे भी थे पर उनपर भी किसी को तरस नहीं आया।

 

तीन दिन मिला खाना

सुखवती के पति तुलसी आदिवासी ने बताया कि सात दिन की पैदल यात्रा में केवल तीन दिन ही ऐसे थे जब रास्ते में खाना मिला। बाकी दिनों जो भी मिलता, हिकारत भरी नजरों से देखता और चलता कर देता। ऐसे में रास्ते में दुकानों से नमकीन, बिस्किट के पैकेट खरीदकर उसी के सहारे रास्ता काटा। कुछ जगहों पर खेत की खड़ी फसल से कच्चे दाने निकालकर भी खाए। लेकिन हौसला नहीं खोया और उसी की दम पर घर पहुंच पाए।

 

पेट में दर्द और पैर के सूजन ने किया बेहाल

सुखवती अपने इस सबसे भयावह पदयात्रा के अनुभव के बारे में बात करते हुए कहती हैं कि अचानक पेट में दर्द उठ आता और पैर में सूजन आ जाती तो चलना मुश्किल हो जाता। रास्ते में किसी पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ जाते तो उसके गांव की साथ चल रही दो महिलाएं मदद करतीं। पर कई बार उसे यह लगता था कि रास्ते में ही दम टूट जाएगा वह घर तक नहीं पहुंच पाएगी।

 

साहब गरीब का कौन होता है

आठ माह के गर्भस्थ शिशु के साथ सुरक्षित घर पहुंची सुखवती कहती हैं कि साहब गरीब का कौन होता है। वह तो भगवान भरोसे है। उसे तो अपने घर के नजदीक पहुंचकर भी मदद नहीं मिली। सुखवती के अनुसार बीते सोमवार की रात्रि को जब यह पृथ्वीपुर पहुंचे और वहां के तालाब पर आराम करने रूके तो कुछ लोगों उसकी ओर ध्यान गया। ऐसे में लोगों ने यहां के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ ही दिखावे की समाजसेवा करने वाले कुछ लोगों से भी मदद करने को कहा, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। रातभर वहां रुके रहे पर कोई नहीं आया। अजनौर पहुंचने के बाद स्टाफ नर्स आईं थीं, चेकप किया और आराम करने की सलाह दी। पैर के सूजन के बारे में भी कहा कि यह ठीक हो जाएगा।

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