हर दो दिन में तीन मासूमों की हो रही मौत

जिला अस्पताल में पिछले 7 माह में जन्म लेने के बाद 147 बच्चों की मौत हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इन 7 माह में 8 माताओं की मौत

By: हामिद खान

Published: 09 Dec 2017, 12:09 PM IST

टीकमगढ़. प्रदेश सरकार के कायाकल्प अभियान में खरा उतरने वाले और नंबर का पुरस्कार जीतने वाले जिला अस्पताल में व्यवस्थाएं कुछ ठीक नहीं हैं। कायाकल्प अभियान में प्रदेश में नंबर वन का पुरस्कार जीतने के बाद जिला अस्पताल में पिछले 7 माह में जन्म लेने के बाद 147 बच्चों की मौत हो चुकी है। खास बात है कि अत्याधुनिक सुविधाओं का दावा करने वाले जिला अस्पताल में नवजातों के जन्म के बाद किसी भी आपात स्थिति के लिए नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई बनाई गई है, लेकिन इसके बावजूद नवजातों की जान नहीं बच पा रही है? सरकारी रिकार्ड का आंकड़ा १४७ बच्चों की मौत अप्रैल 2017 से अक्टूबर तक का है।
जिले के अन्य विकासखंडों की बात करेे तो बड़ागांव धसान स्वास्थ्य केंद्र में ही जहां 46 बच्चों की मौत हुई है। वहीं पलेरा नगर ऐसा है जहां 29 बच्चों ने अस्पताल पहुंचने के पहले ही दम तोड़ दिया है। जिले में यह हालात तब हैं जब प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह के पास जिले का प्रभार है। वहीं केंद्र में महिला एवं बाल विकास मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार टीकमगढ़ का प्रतिनिधित्व करते हुए संसद में बैठते हैं।
हर माह 21 बच्चों की हो रही मौत
महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के नाम पर करोड़ों रुपए सरकार खर्च कर रही है। इसके बावजूद मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी नहीं आ रही है। जिले में कुपोषण से हुई मौतों ने प्रदेश सरकार को एक बार हिलाकर रख दिया था। यह जानकर भी हैरानी होगी कि जिले में पांच साल से कम आयु के मासूम रोजाना इस दुनिया को सदा के लिए अलविदा कह जाते हैं। नवजात की मौत के मामलों में कई बार डॉक्टर और अस्पताल स्टाफ के लापरवाही से इलाज किए जाने के आरोप सामने आते है। लेकिन हालात में पूरी तरह से सुधार नहीं पा रहे हैं। सरकार और जन प्रतिनिधि भले ही सुविधाओं का दावा और वादा करते हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे है कि अभी और व्यवस्थाओं की जरूरत है। जिस प्रकार से मातृ और शिशुओं के स्वास्थ्य को लेकर बजट में रुपए खर्च किया जा रहा है, उसका परिणाम संतोषजनक नहीं हैं। जिला अस्पताल सहित जिले के स्वास्थ्य केन्द्रों पर जब-तब माताओं और शिशुओं की मौत पर हंगामे की स्थिति निर्मित हो जाती है। कई बार डॉक्टरों और कर्मियों के इलाज में लापरवाही के मामले सामने आते हैं।
सात माह में आठ प्रसूताओं की मौत
अप्रैल से अक्टूबर तक छह माह में प्रसूताओं की मौत के आंकडों पर बात की जाए तो स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इन 7 माह में 8 माताओं की मौत हुई। इस हिसाब से जिले में प्रत्येक माह में एक माता की मौत हो जाती है। जिला अस्पताल में पिछले 7 माह में दो प्रसूताएं दम तोड़ चुकी हैं। खास बात है कि 8 में से 5 महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान रक्त को न रोक पाने के कारण हुई। जबकि दो महिलाओं की मौत खून की कमी एनीमिया के कारण हुई है।
छह माह में आंकड़ा पहुंचा 306 पर
स्वास्थ्य विभाग के अप्रैल से अक्टूबर के प्राप्त आंकड़ों ही बता रहे हैं कि पिछले छह माह में शून्य से एक साल तक के जिले में 258 बच्चों की मौत हो गई। इसी तरह शून्य से पांच साल तक के बच्चों की बात करें तो पिछले छह माह के आंकड़ों में 306 बच्चों की मौत बताई जा रही है। इस हिसाब से शून्य से पांच साल आयु के दो दिन में तीन मासूमों की मौत हो रही है।

हामिद खान Desk
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