आचार्य विद्यासागर महाराज का पीपलू में मंगल कलश स्थापना के साथ चातुर्मास शुरु

आचार्य विद्यासागर महाराज के शिष्य क्षुल्लक नयसागर महाराज का 34 वां पावन वर्षायोग चातुर्मास रविवार को ध्वजारोहण, मंगलकलश स्थापना, श्रीजी की शोभायात्रा, जिनेंन्द्र भगवान की शांतिधारा, चित्र अनावरण के साथ शुरु हुआ हैं।

By: pawan sharma

Published: 13 Jul 2020, 07:31 AM IST

पीपलू (रा.क.). आचार्य विद्यासागर महाराज के शिष्य क्षुल्लक नयसागर महाराज का 34 वां पावन वर्षायोग चातुर्मास रविवार को ध्वजारोहण, मंगलकलश स्थापना, श्रीजी की शोभायात्रा, जिनेंन्द्र भगवान की शांतिधारा, चित्र अनावरण के साथ शुरु हुआ हैं। सकल दिगंबर जैन समाज एवं वर्षायोग समिति के तत्वावधान में दिगंबर जैन मंदिर पीपलू से चंद्रवाटिका तक श्रीजी की मंगलकलशों के साथ शोभयात्रा निकाली गई।

चंद्रवाटिका परिसर में भगवान की साधना और श्रावकों की आराधना के महापर्व के मंगल कलश की स्थापना से पूर्व पंडित अनिल शास्त्री के निर्देशन में विभिन्न प्रकार की बोलियां लगाई गई। जैन सोशल ग्रुप की बालिकाओं द्वारा मंगला चरण की प्रस्तुति दी गई। इस दौरान मंडप उद्घाटन कजोड़मल, पूरणमल एवं भगवान चंद्रप्रभु एवं आचार्य विद्यासागर महाराज के चित्र अनावरण का सौभाग्य कैलाशचंद, महावीरप्रसाद, टीकमचंद जैन को मिला हैं।

इसी तरह दीप प्रज्जवलन का सौभाग्य नेमीचंद, विमलकुमार, विनोदकुमार, झंडारोहण का सौभाग्य रायचंद, बिच्छुमल, ओमप्रकाश, मंगलकलश स्थापना का सौभाग्य लड्डूलाल, विमलकुमार, निर्मलकुमार को मिला है। इस दौरान अन्य कलशों की बोलियां, क्षुल्लक महाराज को जिनवाणी, वस्त्र भेंट करने को लेकर बोलियां लगाई गई।कार्यक्रम का मंच संचालन अतुलकुमार जैन ने किया। वहीं नरेंद्रकुमार महुआ ने संगीतकार ने संगीतमय प्रस्तुतियां दी। कार्यक्रम में अजमेर, जयपुर, टोंक, झिराना, प्यावड़ी, बगड़ी आदि स्थानों से जैन समाज के लोग मौजूद रहे।

पुण्य की संपदा जीवन की सबसे बड़ी संपदा
क्षुल्लक नयसागर महाराज ने चातुर्मास मंगल कलश स्थापना की विधि-विधान पूर्वक क्रियाएं करवाई। धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए क्षुल्लक नयसागर महाराज ने चातुर्मास की महिमा का गुणगान किया और सभी को मंगल आशीर्वाद दिया। क्षुल्लक नयसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि वर्षा योग काल में अनेकों धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से पुण्य कमाने का अवसर प्राप्त होता है और पुण्य ही अरिहंत पद को प्रदान करता है।

धन संपदा तो क्षणभंगुर है मगर पुण्य की संपदा दुनिया की सबसे बड़ी संपदा है। जिसे पाकर जीवन धन्य हो जाता है। उन्होंने आगे कहा कि चातुर्मास श्रवण और श्रावक को बंधन में बंद कर संयम के मार्ग उत्तरोत्तर बढऩे का समय है। इसलिए इस वर्षा योग भी कहते है। पानी के इक_ा होने पर जमीन की प्यास बुझ जाती है और चातुर्मास में गुरू के चरणों में बैठकर ज्ञान की आराधना करने से मन के अंदर से कषायों का मेलधुल जाता है।

चातुर्मास चतुर लोगों के लिए है जो तीतर से तीर्थंकर बनना चाहते है, कंस से परमहंस बनना चाहते है, नर से नारायण बनना चाहते है। वह ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाते है संयम और आचरण से अपने जीवन का श्रृंगार करते है। उनका जीवन तीर्थ की तरह पवित्र हो जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि जीवन में तमाशा जरूर देखें मगर जिंदगी को तमाशा न बनने दें जो लोग जिंदगी को तमाशा बना लिया करते है उनकी जिंदगी अभिशाप बन जाती है। जिंदगी को उपहार और वरदान बनाने का पुरूषार्थ करना चाहिए। जिससे यह छोटा सा जीवन आने वाले भविष्य का सुंदर निर्माण कर सके। कार्यक्रम के अंत में मंगल आरती की गई।

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