आग लगने पर ही खोदेंगे कुआं!

'आग लगने पर ही कुआं खोदने वाली कहावत जिले के प्रशासनिक अधिकारियों पर सटीक बैठती है। इसका कारण है

By: मुकेश शर्मा

Published: 19 Apr 2016, 11:30 PM IST

टोंक।'आग लगने पर ही कुआं खोदनेÓ वाली कहावत जिले के प्रशासनिक अधिकारियों पर सटीक बैठती है। इसका कारण है कि बड़े हादसों के बाद ही प्रशासन चेतता है। इसके बाद शुरू होता है कार्रवाई का दौर, जो कुछ दिन चलता है।

बाद में स्थिति 'ढाक के तीन पातÓ वाली हो जाती है। यही आलम शहर में बरसाती पानी की निकासी को लेकर है। हर साल मामूली बरसात में शहर के इलाके जलमग्न होने पर आनन-फानन में सड़कें काटी जाती हैं। नालों की सफाई कराई जाती है। नालों से अतिक्रमण हटाया जाता है, लेकिन बरसात जाने के बाद इसे फिर से भुला दिया जाता है। नगर परिषद की सुस्ती का आलम ये है कि मानसून आने से पहले पानी निकासी की कार्य योजना भी तैयार नहीं की जाती। जहां मौसम विभाग इस बार पर्याप्त बरसात होने की भविष्यवाणी कर रहा है, वहीं नगर परिषद इससे बेखबर है। अभी से इस बारे में कार्रवाई शुरू नहीं की गई तो फिर से बस्तियां जलमग्न होंगी। कई मकान ढह जाएंगे। सैकड़ों लोग बेघर हो जाएंगे। हालांकि  उपखण्ड अधिकारी डॉ. सूरजसिंह नेगी ने कुछ सतर्कता दिखाई है। उन्होंने पानी के निकास को लेकर तहसीलदार को पत्र लिखा है।

गौरतलब है कि प्रशासनिक लापरवाही हर बार शहर के लोगों पर भारी पड़ती है। बरसात के दिनों में शहर की बस्तियों के जलमग्न होने पर लोग प्रदर्शन पर उतारू हो जाते हैं, तब नगर परिषद की नींद टूटती है। फिर कराई जाती है नालों की सफाई तथा पानी का निकास। ऐसा कई दशकों से चला आ रहा है। पिछले साल शहर की एक दर्जन से अधिक बस्तियों के मकान पानी से घिर गए। तीन सौ से अधिक कच्चे मकान गिर गए। इन दिनों गर्मी चरम पर है। सम्भवतया दो महीने बाद ही मानसून दस्तक देने वाला है। अभी तक नगर परिषद ने शहर के बंद नालों की सफाई कराने की तैयारी नहीं की है।

जबकि शहर में पचास से अधिक बड़े नाले हैं। इनकी सफाई में एक महीने से अधिक समय लगता है। अब मानसून में दो महीने बचे हैं, लेकिन परिषद नालों के सफाई के प्रति अभी तक सजग नहीं है।  

शहर के ये हैं मुख्य नाले

शहर में दस मुख्य बड़े नाले ऐसे हैं, जो रियासतकालीन है। नगर परिषद के पास ये सभी कदमी नाले के नाम से इन्द्राज हंै। अधिकतर नालों का पानी रेडियावास के तालाब में
आता है।

इनमें मुख्य तथा सबसे बड़ा चतरा खटीक का नाला है। उल्लेखनीय है कि इस नाले की सफाई नहीं होने पर वर्ष 1981 में ये उफान पर आ गया तथा शहर जलमग्न हो गया था। वर्तमान स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यह नाला काली पलटन के कई इलाकों का पानी मोहम्मद खां के पुल, काफला मस्जिद के पास, गाडिय़ों का अड्डा, बावड़ी होते हुए रेडियावास तालाब में ले जाता है।

इसके अलावा तेलियान तालाब की ओगाल, खादी भण्डार की गली वाले नाले, बग्गी खाना, नजरबाग, सआदत गंज, वाल्मीकि बस्ती से आने वाले नालों का पानी भी इसी तालाब में आता है। पुरानी टोंक से निकलने वाला पानी मालपुरा दरवाजे से होते हुए कॉलेज के पास महादेवाली तालाब में आता है। इसके अलावा इस तालाब में चूड़ीगराना, मेहंदवास गेट, पुराना बस स्टैण्ड व घंटाघर क्षेत्र का पानी आता है। पुलिस लाइन, छावनी, बस स्टैण्ड, हाउसिंग बोर्ड, अन्नपूर्णा समेत अन्य कॉलोनियों का पानी अन्नपूर्णा गणेश मंदिर के समीप बने तालाब में आता है। ये सभी नाले सफाई के अभाव में कचरे से अटे हैं।

ऐसे कराया था निकास

तालकटोरा, रेडियावास, धन्नातलाई, कम्पू, छावनी, मराठा कॉलोनी, अन्नपूर्णा समेत एक दर्जन कॉलोनियों में पिछले साल भरे पानी को निकालने के लिए नगर परिषद को कई डीजल इंजन लगाने पड़े थे। इसके अलावा आधा दर्जन सड़कों को नगर परिषद ने काट दिया था। इसके बाद ही पानी को निकास हो सका था।

पहले करेंगे तैयारी

 इस साल अच्छे मानसून की उम्मीद है। शहर में पानी निकास तथा मानसून पूर्व की तैयारियों को लेकर आयुक्त को पत्र लिखा जाएगा। तहसीलदार तथा नगर परिषद के अधिकारियों से बात कर सभी तैयारियां पहले करा ली जाएगी, ताकि बरसात में कॉलोनियों में पानी नहीं भरे।
डॉ. सूरजसिंह नेगी,  उपखण्ड अधिकारी, टोंक।
मुकेश शर्मा Reporting
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