संकट में टोंक डिपो: आगार में दिनों-दिन घट रहा रोडवेज का आंकड़ा, एक के लिए दे रहे दूसरे की बलि

नए पार्टस नहीं मिलने से एक को सही करने के लिए मिस्त्री दूसरी बस की बलि दे रहे है। ऐसे में आगार की बसों का आंकड़ा घटता जा रहा है।

By: pawan sharma

Published: 24 Jul 2018, 08:50 AM IST

टोंक. टोंक आगार में एक के बाद एक बस खराब होकर वर्कशॉप में खड़ी हो रही है। इतना ही नहीं नए पार्टस नहीं मिलने से एक को सही करने के लिए मिस्त्री दूसरी बस की बलि दे रहे है। ऐसे में आगार की बसों का आंकड़ा घटता जा रहा है।

 

ऐसी स्थिति जारी रही तो वर्ष 2022 तक मार्गों पर रोडवेज दौड़ती दिखाई नहीं देगी। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले पांच वर्षों में आगार की बसों की संख्या घटते हुए महज 80 रह गई। आगार में कबानियों समेत स्पेयर पार्टस का अभाव यात्रियों की जान पर भारी साबित हो रहा है।

 

यही कारण है कि चालक बिना फिट रोडवेज ही बेड़े से निकाल कर रामभरोसे सडक़ों पर दौड़ा रहे हैं। हालांकि खड़ी रोडवेज से ही पुर्जों को रिपेयर कर मिस्त्री बसों में लगा रहे हैं।

 

रोडवेज कर्मियों के मुताबिक आवश्यकता के मुकाबले न्यूनतम पार्टस भी आगार को नहीं मिल रहे। सूत्रों के मुताबिक एफआई पंप व अन्य पार्टस का सर्वाधिक अभाव है।

 


अधिक जरूरत कमानी व टायरों की
मरम्मत का अभाव व पार्टस की कमी के चलते दौडऩे वाली कई बसें ब्रेक-डाउन होकर रास्ते में खड़ी भी हो रही है। देवली, सवाईमाधोपुर, टोडारायसिंह-मालपुरा आदि मार्गों पर आए दिन बसों का ब्रेक डाउन होना आम है।

 

मिस्त्रियों के मुताबिक रूचिट (ब्रेक पार्टस) की कमी से भी बसों में ब्रेक कम आने की शिकायतें अधिक सामने आ रही है। रूचिट पार्टस के अभाव में दु्रतगामी बसों के चालक तेज चलाने में हिचक रहे है। इसके साथ ही टायर, कमानी, बैट्री, झूले, नक्कें हेंगर, नटबोल्ट, आरसी एसेम्बली इंजन भी मांग के अनुरूप नहीं मिले रहे हैं।

 

आबादी बढ़ी, बेड़ा घटा
आगार में बीते कई वर्षों से बसों में इजाफा नहीं हुआ। हालांकि अनुबन्ध के तहत जरूर बसों की संख्या बढ़ रही है। दूसरी ओर दर्जनभर बसें नाकारा घोषित कर दी गई।

 

ऐसी ही स्थिति जारी रही तो वर्ष 2022 तक रोडवेज की अपनी कोई बस मार्ग पर दौड़ती दिखाई नहीं देगी। इसका कारण यह है कि अधिकतर बसें निर्धारित समय व किलोमीटर पूरे कर चुकी है। हालत यह है कि 2013 के बाद टोंक आगार को नहीं मिली।


8 वर्ष या 8 लाख किलोमीटर
वर्ष 2013 में जब जिले की आबादी 12 लाख ही थी। उस दौरान बेड़े में बसों की संख्या 99 थी। अब जिले की आबादी साढ़े 14 लाख से अधिक होने के बावजूद भी बेड़े में महज 80 बसें ही है।

 

आगार की 80 बसोंं में से दो बसें ही वर्ष 2014 मॉडल की है। जबकि अन्य सभी बसें वर्ष 2008 से 2013 मॉडल की है। जो अपने किलोमीटर व कार्यकाल पूरे कर चुकी है। सूत्रों के मुताबिक 8 लाख किलोमीटर चलने या फिर 8 वर्ष पूरे होने पर बस को नकारा मान लिया जाता है।

 

संसाधनों की तंगी
आगार में कमानियों, टायर समेत पार्टस का तो अभाव है। कई वर्षों से आगार की अपनी बसों का आवंटन भी नहीं हो पाया। इसको लेकर उच्चाधिकारियों से बसों की मांग की हुई है। फिलहाल उपलब्ध बसों से ही सुचारू संचालन करा रहे हैं।
रामचरण गोचर, मुख्य आगार प्रबन्धक टोंक।

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