# Global warming: गड़बड़ाया तापमान 21वीं सदी में सबसे बड़े खतरे का संकेत

# Global warming: गड़बड़ाया तापमान 21वीं सदी में सबसे बड़े खतरे का संकेत
टोंक. दिन व रात के तापमान में भारी अन्तर के चलते फसल चक्र गड़बड़ा गया है। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो ग्लोबल वार्मिंग 21वीं सदी में सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने आएगी।

Pawan Kumar Sharma | Publish: Oct, 25 2017 08:27:30 AM (IST) Gulzar Bagh, Tonk, Rajasthan, India

ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से बचने के लिए विलासितापूर्ण जीवन त्यागना पड़ेगा।

 

टोंक.

दिन व रात के तापमान में भारी अन्तर के चलते फसल चक्र गड़बड़ा गया है। लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकतम व न्यूनतम तापमान में 10 डिग्री सेल्सियस से अधिक का अन्तर नहीं रहना चाहिए। जबकि कुछ वर्षों में देखने में आ रहा है कि दिन व रात के तापमान में दोगुना अन्तर आ गया है। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो ग्लोबल वार्मिंग 21वीं सदी में सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने आएगी।

 


जिले का अधिकतम तापमान मंगलवार को 36 व न्यूनतम तापमान 17 डिग्री सेल्सियस रहा। तापमान की अधिकता किसानोंं समेत लोगों के अरमानों पर भारी साबित हो रही है। अक्टूबर में भी सर्दी की रंगत शुरू नहीं हो पा रही। बुजुर्गों का कहना है कि अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह में अधिकतम 25 व न्यूनतम 20 डिग्री तापमान रहता आया है।

 

 

जबकि इन दिनों औसत तापमान 34 डिग्री से अधिक रहने से रबी की बुवाई को पंख नहीं लग पा रहे। दरअसल में हर वर्ष कभी अल्प तो कभी अतिवृष्टि देखने को मिल रही है। प्रत्येक वर्ष गर्मी का आंकड़ा तो बढ़़ रहा है, जबकि सर्दी की रंगत कम हो रही है। यही कारण है कि किसानों का रुझान गेहूं के स्थान पर सरसों व चने के प्रति अधिक हो रहा है।

 

 


गेहूं की फसल में तेज सर्दी से ही निखार आता है। सरसों व चने की फसल को कड़ाके की सर्दी की आवश्यकता नहीं होती। आलम यह है कि रबी बुवाई का लक्ष्य 4 लाख 32 हजार 400 हैक्टेयर प्रस्तावित है, लेकिन अभी तक महज 60 हजार हैक्टेयर में ही रबी की बुवाई हो सकी है।

 

 

सरसों की बुवाई के लिए जिले का औसत तापमान 28 डिग्री सेल्सियस होना आवश्यक है। जबकि इन दिनों तापमान 37 डिग्री सेल्सियस चल रहा है। कृषि अधिकारियों का भी मानना है कि तापमान मेंं जल्द गिरावट नहीं आई तो फसल चक्र गड़बड़ा जाएगा।

 

भूमि की नमी समाप्त
समय पर बुवाई के लिए उपयुक्त तापमान या भूमि में नमी की आवश्यकता होती है। इन दिनों दिन में पड़ रही तेज धूप से भूमि की नमी समाप्त हो गई। बारिश भी कम हुई। तापमान भी एक सप्ताह से औसत 33 डिग्री सेल्सियस से अधिक चल रहा है। इससे किसान सरसों की बुवाई करने से हिचक रहे हैं।

 


बदल रहा चक्र

पृथ्वी के तापमान में हो रही बढ़ोतरी से मौसम में परिवर्तन आ रहा है। जमा बर्फ पिघल रही है तथा ग्लेशियर खत्म हो रहे हैं। समुन्द्रों का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में विश्व के कई देश व द्वीप के पानी में समाने का खतरा बढ़ गया है। देश के भी कई बन्दरगाह व तटीय शहरों में ऐसी चेतावनी दी जा चुकी है।

 

 

बढ़ते वैश्विक तपन से मानव समेत जीव-जन्तुओं में त्वचा कैंसर समेत कई बीमारियां सामने आ रही है। फसल, ऋतु चक्र प्रभावित हो रहे हैं। दिन व रात के तापमान में आ रहा अधिक अन्तर भी ग्लोबल वार्मिंग का ही परिणाम है। अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र कम वर्षा में तथा कम वाले अधिक वर्षा के क्षेत्र में तब्दील हो रहे है। इन परिवर्तनों का प्रमुख कारण गैस है।

 

इनमें एसी व फ्रिज की गैस शामिल है। सूर्य की तेज गर्मी को पृथ्वी नहीं सौंख पा रही। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से बचने के लिए विलासितापूर्ण जीवन त्यागना पड़ेगा। प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित किए जाने से ही ग्लोबल वार्मिंग से बचाव सम्भव है।

 

सआदत अस्पताल में बढ़ रहे रोगी

सआदत अस्पताल के मेडिकल वार्ड में मरीजों का भार लगातार बढ़ता जा रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि दिन व रात के तापमान में अधिक अन्तर से लोग सर्दी, खांसी व बुखार से पीडि़त होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। सआदत अस्पताल स्थित वार्डों में इन दिनों सर्वाधिक रोगी मेडिकल वार्ड में भर्ती हैं। इसके अलावा शिशुओं के बीमार होने का सिलसिला भी बढ़ा है। वायरल फीवर की चपेट में आकर कई शिशु अस्पताल पहुंच रहे हैं।

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