विकास को तरसता हाथीभाटा स्थल

टोंक. जिले की गोठड़ा ग्राम पंचायत में खेड़ा गांव के समीप राष्ट्रीय राज मार्ग 116 से मात्र एक किलोमीटर दूरी पर स्थित हाथीभाटा पर्यटन स्थल राजनैतिक प्रशासनिक एवं पर्यटन व पुरातात्विक विभाग की अनदेखी का शिकार बन कर विकास को आज भी तरसता नजर आ रहा है।

By: jalaluddin khan

Published: 18 Oct 2020, 08:38 PM IST

विकास को तरसता हाथीभाटा स्थल
टोंक. जिले की गोठड़ा ग्राम पंचायत में खेड़ा गांव के समीप राष्ट्रीय राज मार्ग 116 से मात्र एक किलोमीटर दूरी पर स्थित हाथीभाटा पर्यटन स्थल राजनैतिक प्रशासनिक एवं पर्यटन व पुरातात्विक विभाग की अनदेखी का शिकार बन कर विकास को आज भी तरसता नजर आ रहा है।

जिससे पर्यटकों की दृष्टि से यह स्थल ओझल होकर उनको लुभाने में कामयाब नहीं हो पाया है। हाथीभाटा स्थल टोंक-सवाईमाधोपुर राष्ट्रीय राज मार्ग 116 के मध्य मार्ग से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर अरावली पहाडिय़ों के मध्य स्थित है।

यहां तत्कालीन शिल्पियों ने पहाड़ी को तरासकर विशालकाय हाथी खड़ी मुद्रा में निर्मित किया था, जो आज भी दूर से सजीव प्रतीत होता है। साथ ही इसके 22 बीघा जमीन पर कई वर्षो पूर्व जिला प्रशासन ने चारदीवारी बनाई थी।

लेकिन अब मुख्य द्वार एवं दीवारें क्षतिग्रस्त होने से इस स्थल की सुरक्षा नहीं होने से किए गए वृक्षारोपण नष्ट होने के कगार पर है, जिससे इसके आसपास की सुनहरी प्राकृतिक छटा मैदान व पहाडिय़ां पर्यटकों को लुभाने में अभी तक कारगर साबित नहीं हो पा रही है।


लुभाती है 64 थालियां
हाथी भाटा के स्थल पर विशालकाय पाषाण के हाथी से मात्र 50 फीट की दूरी पर क्रमानुसार चारों तरफ पाषाण को तरासकर बनाई गई 64 थालियां है।

वहीं इसके मध्य रिक्त स्थान बना हुआ है। लोगों का मानना है कि हाथी की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के दौरान इन थालियों का उपयोग हवनकुण्ड कार्य के लिए किया होगा। वहीं कई लोग इसे शिल्पकारों की संख्या 64 होने का प्रमाण बताते है।


दो कुण्ड व शिवालय
इस स्थल पर वी आकार के दो कुण्ड पाषाण के हाथी के समीप बने हुए है, जिसमें वर्षाकाल का पानी भरा रहने से इस स्थल पर चारचांद की लगाते प्रतीत होते है। लेकिन इन कुण्डों की सुरक्षा प्रबन्ध नहीं होने से कई बार दुघर्टनाएं घटित होती रहती है।

विशालकाय हाथी के ठीक सामने 500 मीटर की दूरी पर पहाड़ी के शिखर पर शिवालय स्थित है। जिसमें स्थित शिवलिंग के 90 डिग्री पर हाथी स्थित होने पर श्रद्वालु इसे गणेश प्रतिमा मान कर यहां पूजा-अर्चना करने आते है।


सौन्दर्यकरण का अभाव
इस पर्यटन स्थल पर जिला प्रशासन व पुरातत्व एवं पर्यटन विभाग की नजर तो है, लेकिन अधिकारियों के द्वारा कई बार इस स्थल का अवलोकन करने के बाद भी स्थल का सौन्दर्यकरण नहीं हो पा रहा है।

जानकारी के अनुसार जिला प्रशासन पुरातत्व व पर्यटन विभाग की विकास के लिए हुई बैठकों में इस स्थल का विकास एवं प्रचार-प्रसार व सौन्दर्यकरण का दायित्व पर्यटन विभाग को सौंपा गया है, लेकिन अभी तक इस स्थल के प्रचार-प्रसार व सुरक्षा व सौन्दर्यरीकरण के पुख्ता कार्य नहीं होने से इस स्थल के विकास को गति नहीं मिल पाई है।


इस स्थल पर वर्षाकाल में स्थानीय एवं आसपास के लोगों द्वारा वन विहार करने आनेवालो का तांता लगा रहता है, लेकिन स्थल पर शुद्व पेयजल नहीं होने और रोशनी के अभाव में परेशान होकर निराश लौटते नजर आते है।

इस स्थल पर दो हैण्डपम्प है, जिसमें से एक क्षतिग्रस्त अवस्था में कई वर्षो से नकारा पड़ा हुआ है। दूसरे हैण्ड़पम्प में फ्लोराइड युक्त पानी होने एवं आए दिन खराब होने से यहां आने वाले लोगों को पेयजल समस्या से जुझना पड़ता है।

हाथी के कान पर लेख अंकित
विशालकाय पाषाण हाथी पर कई चित्र व आकर्षक बनावट है। वहीं हाथी के दोनों कानों पर पांच पक्तियों में देव नागरी लिपी में लेख लिखे हुए है, जो समय के अनुसार वर्षों पुराने होने से स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे है।

लेकिन कई इतिहासकार व पुरातात्विक ज्ञाता इसे मध्यकाल में निर्मित होना मान रहे है। वहीं पुरातन प्रचलित क्विदंतियों व बुजुर्गों तथा वर्तमान में यहां के सेवक पण्डित देवकीनन्दन शर्मा के अनुसार यह स्थल 5 हजार 148 वर्ष पुराना पाण्डवों के अज्ञात वास के दौरान एक ही रात में निर्मित होना मानकर पाषाणकाल की कला की निशानी का नमूना मान रहे है।

बजट की दरकार
यह स्थल भारतीय पुरातत्व एवं सरक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है। तथा इसके प्रचार-प्रसार का दायित्व पर्यटन विभाग के पास है, जिसको लेकर जिला प्रशासन एवं विभागीय स्तर पर संयुक्त बैठकों के दौरान इसको विकसित करने के लिए गए प्रस्ताव उच्चाधिकारियों को भिजवाए हुए है। अनुमति व बजट मिलते ही विकास कार्य करवाए जाएंगे।
मधुसुदन सिंह सहायक निदेशक पर्यटन विकास सवाई माधोपुर।

jalaluddin khan Reporting
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