संरक्षण का बोर्ड लगाकर भूले, खण्डहर में तब्दील हो रही है धरोहर

संरक्षण का बोर्ड लगाकर भूले, खण्डहर में तब्दील हो रही है धरोहर

 

By: pawan sharma

Published: 20 Nov 2020, 04:41 PM IST

टोडारायसिंह. अतित का गौरव बयां करने वाले रियासतकालीन निर्मित प्राचीन महल, मंदिर व बावडिय़ां समेत अन्य ऐतिहासिक धरोहर आज भी उपेक्षित है। स्थिति यह है कि पुरातत्व विभाग, यहां सरक्षित प्राचीन मंदिरों के द्वार पर संरक्षण का बोर्ड लगाकर संरक्षण व पर्यटन की दृष्टि से विकसित करना ही भूल गए है।


उल्लेखनीय है कि तक्षकगिरी पहाड़ी तलहटी स्थित टोडारायसिंह शहर को ऐतिहासिक धरोहरों की खान कह दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि यहां प्राचीन महल, मंदिर व साढ़े तीन सौ बावडिय़ां समेत प्राकृतिक सौन्दर्यता लिए प्राचीन जलाशय स्थित है।

विशाल पत्थरों से निर्मित वास्तुकला, शिल्प व बैजोड़ता लिए ये पुरा सम्पदा प्राचीन गाथा को बयां करते है। तेरहवीं सदी में सोलंकी शासकों द्वारा निर्मित महल में लगे नौ हाथ के छज्जे आज भी दर्शकों को रिझाते है। छह मंजिलें महलों में कई हाल, कमरे व चौबारे स्थित है।

इनमें विशाल दीवाने आम, दीवाने खास और महलों के बीच कुण्ड में बारहदरी जो कि बारह संगमरमर के खम्भों पर निर्मित है। जहां चित्रकारी व मीनाकारी का भी सुंदर समावेश था, लेकिन पुरातत्व विभाग, मंदिरो को छोड़ शेष प्राचीन महल, बावडिय़ों व अन्य इमारतों को संरक्षण व पर्यटन की विकसित करना मुनासिब नहीं समझा। स्थिति यह है कि ये धरोहर आज भी उपेक्षित है।

पर्यटन की दृष्टि से उपेक्षित: पुरातत्व विभाग ने शहर के मध्य स्थित श्रीकल्याणजी का मंदिर, श्रीगोपीनाथजी का मंदिर, श्री कालाकोट का मंदिर, श्री श्याम देवरा मंदिर व बीसलपुर स्थित श्री बीसलदेव का मंदिर को संरक्षण की दृष्टि से अधिग्रहण तो कर लिया, लेकिन पर्यटन की दृष्टि से उक्त मंदिर आज भी उपेक्षित है। स्थिति यह है कि विभाग ने चार दशक पूर्व अधिग्रहण की गई धरोहरों के द्वार पर साइन बोर्ड लगाकर इतिश्री कर दी।

जबकि संरक्षित धरोहर की दुर्दशा की ओर विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया। धार्मिक आस्था के साथ बैजोड़ता व वास्तुकला लिए मंदिर आज भी सौंदर्यता व आधुनिक विकास के लिए महरूम है। शहरवासियों का कहना है कि श्याम देवरा व कालाकोट के मंदिर तत्कालीन आततायी शासकों का शिकार रहे है।

खण्डर में तब्दील, इर्द-गिर्द परिसर में पड़े मंदिर के अवशेष (पत्थर) तात्कालीक भयावहता को बयां करते है। तत्कालीन वास्तु, शिल्प व निर्माणकला अद्वितीय थी, लेकिन आज मंदिरो के अवशेषों (पत्थरों) को विभागीय अभियंता पूर्वत: स्थापित नहीं कर पा रहे है। वही उपेक्षित धरोहर, संरक्षण व सौंदयर्ता के अभाव में सैलानियों को आकर्षित नहीं कर पा रहे है, जिसके चलते दिभर आस पड़ौस के लोग मंदिर परिसर व सीढिय़ों पर बैठकर ताशपत्ती खेलते नजर आते है।
शहरवासियों का कहना है कि संरक्षित धरोहरो के साथ अन्य प्राचीन महल, बावड़ी व अन्य इमारतो को संरक्षण देकर पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए तो टोडारायसिंह पर्यटन क्षेत्र में अलग पहचान बना सकता है।

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