अतिक्रमण व अवैध खनन ने रोकी चतुर्भुज तालाब में पानी की आवक

अतिक्रमण व अवैध खनन ने रोकी चतुर्भुज तालाब में पानी की आवक

 

By: pawan sharma

Published: 25 Aug 2020, 09:00 AM IST

पवन शर्मा

टोंक. टोंक शहर में स्थित धार्मिक आस्था से जुडे ऐतिहासिक चतुर्भुज तालाब में पानी की आवक के रास्ते में अवैध खनन व अतिक्रमण रोड़ा बने हुए है। इस कारण बरसात के मौसम मे भी तालाब में पानी की कमी बनी हुई है। तालाब विकास के लिए बनी समिती ने जिला प्रशासन व जनप्रतिधियों से अतिक्रमण पर कार्रवाई की मांग को लेकर कई बार ज्ञापन दे धरने-प्रदर्शन तक कर चुकी है, लेकिन आज तक कोई भी ठोस कार्रवाई को अंजाम नही दे पाए है। तालाब की भूमी पर अतिक्रमण की शिकायत पर परिषद की ओर से एक-दो बार फोरी कार्रवाई कर खानापूर्ति कर इति श्री कर ली गई।

अवैध खनन ने रोका पानी
तालाब के चारों ओर पहाडियों में न्यायालय की रोक के बाद भी लगातार पत्थरों का अवैध खनन किया जा रहा है। खनन के कारण कई पहाडिय़ों तो जतीदोज हो चुकी है। कई जगह जरुरत से ज्यादा खनन होने पर पहाड़ खानों में तब्दिल हो चुके है। इस कारण बरसात का पानी तालाब में ना जाकर यहीं खानों में जमा हो रहा है। जमा पानी में कई बार डूबने से जानमाल की भी हानी हो चुकी है।

प्रभावशाली के सामने प्रशासन बोना
तालाब के पेटे व आसपास कई प्रभावशाली लोगों ने कच्चे-पक्के निर्माण कर पानी के बहाव क्षेत्रों में अतिक्रमण किया हुआ है। जिसकी शिकायत पर प्रशासन ने आज तक कोई कठोर कार्रवाई नही की। हाल ही में तात्कालीन जिला कलक्टर केके शर्मा व सभापति अली अहमद ने अन्य अधिकारियों के साथ यहां का दौरा किया था

तब तालाब विकास समिती के सदस्यों ने अतिक्रण हटवाने सहित पानी की आवक के रास्तों को खुलासा करने की मांग की थी। जिस पर कलक्टर ने वहां मौजूद तहसीलदार, नगरपरिषद व वन विभाग के अधिकारियों को तथ्यात्मक रिपोर्ट सात दिवस में पेश करने के निर्देश दि थे। लकिन कुछ ही दिनों के बाद शर्मा को टोंक से तबादला हो गया ।

सर्वसमाज की आस्था का प्रतिक है ऐतिहासिक चतुर्भुज तालाब

चारों तरफ अरावली पर्वत मालाओं की श्रृखलां से घिरे रियासतकालीन सर्व समाज की धार्मिक आस्था का केन्द्र चतुर्भुज तालाब पंचकुईया दरवाजा के पास बना हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार इस तालाब का निर्माण संवत 1531 में राव सातलदेव ने करवाया था।

तालाब के बीचों- बीच बनी छतरी की यादें भी टोंक के प्रथम नवाब अमीरूद्दौला और उनके सेनापति लाल बहादुर सिंह से जुड़ी हुई हैं। इस तालाब में आज भी जलझूलनी एकादशी पर डोलों का विसर्जन, दिपावली पर गुर्जरों समाज की ओर से छांट भरने की रस्म, अन्नतचर्तुदशी पर गणेश विसर्जन,गणगौर मेला विसर्जन, देवश्यनी एकादशी विसर्जन और गणेश विर्सजन आदि के आयोजन होते है।

-जनप्रतिनिधी फोटों खिचवाने तक सीमित
नगर परिषद के तात्कालीन भाजपा बोर्ड में सांसद व सभापति ने तालाब का दौरा कर वहां पर पौधारोपण किया था, तब भी लोगों ने सम्पूर्ण तालाब का सीमाज्ञान करवाकर किए गए अतिक्रण को हटवाकर पानी की आवक के रास्तों को खुलासा करने की मांग रखी थी। जिस पर सांसद ओर सभापति ने चतुर्भुज तालाब के पुराने गौरव को लौटाए जाने की बात कह थी। पौधारोपण की अखबारों में फोटों तो आ गई लेकिन तब से लेकर आज तक तालाब के पेटे व आसपास हुए अतिक्रमण पर कोई ठोस कार्रवाई नही हो सकी। नतीजन तालाब अपना पुराना वैभव खोता जा रहा है।

-गंदा नाला भी बना है नासूर
जानकारों का कहना है कि तालाब निर्माण के समय यहां आसपास कोई बस्ती नही थी, ना ही कोई गंदे पानी का था, तालाब में सिर्फ बरसात का ही साफ पानी रहता था। लेकिन धीरे-तालाब के पास आबादी बसने के कारण घरों से निकलने वाला गंदा पानी नाले के जरिए तालाब के पानी को प्रदूषित कर रहा है। जिस कारण तालाब के पानी से दुर्गधं भी आने लगी है। लोगों की मांग पर तात्कालीन नगर परिषद सभापति ने एक धार्मिक आयोजन में मंच से इस नाले को पूर्ण रूप से बंद करने की बात भी कही थी लेकिन वो भी बीती बात हो गई।


-हिन्दु मेला उत्सव समिति भी दे चुकी कई ज्ञापन
अपना वैभव खोते चतुर्भुज तालाब के वजूद को बचाएं रखने के लिए मेला उत्सव समिति की ओर से भीद कई बार जिला कलक्टर व नगर परिषद को ज्ञापन के माध्यम से आवगत कराया जाता रहा है लेकिन तालाब के पेटे से प्रभावशाली लोगों का अतिक्रमण तो हट नही पाया बल्कि दिनोदिन नए अतिक्रमणों से तालाब का स्वरूप बिगडऩे लगा है।

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