व्याख्यान : आजादी में राष्ट्रभाषा हिंदी का अग्रणी योगदान रहा- मुजीब

व्याख्यान : आजादी में राष्ट्रभाषा हिंदी का अग्रणी योगदान रहा- मुजीब

 

By: pawan sharma

Published: 15 Sep 2020, 09:51 PM IST

टोंक. मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी फारसी शोध संस्थान में महात्मा गांधी और राष्ट्रभाषा हिंदी विषय पर व्याख्यान का आयोजन हुआ। इसमें मुख्य अतिथि गांधीवादी विचारक मुजीब आजाद ने कहा कि देश को आजादी तो 1947 में मिली, लेकिन इससे पहले ही 1936 में जब आजादी का आंदोलन चल रहा था उस वक्त राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी को विचार अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी के महत्व को समझते हुए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा का गठन किया था।


इस गठन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ उस समय के स्वाधीनता सेनानी डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल, राज ऋषि, पुरुषोत्तम दास टंडन, डॉ. जाकिर हुसैन, आचार्य नरेंद्र देव, आचार्य काकासाहब कालेलकर, बाबा राघव दास, जमुनालाल बजाज ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति संस्थापक सदस्य बने। आज जब गांधी और सुभाष में वैचारिक मतभेदों की बात सामने सुनने में मिलती है तो आश्चर्य होता है।

गांधी और सुभाष वैचारिक रूप से विपरीत नहीं एक दूसरे के पूरक हैं। इसे समझने के लिए इतना ही काफी है कि राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का गठन दोनों ने मिलकर किया और इसकी कामयाबी 14 सितंबर 1949 को उस समय मिली जब संविधान सभा ने राष्ट्रभाषा का दर्जा हिंदी को दे दिया। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953 में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाने का फैसला लिया गया।

उसके बाद से आज तक हिंदी दिवस को सप्ताह और पखवाड़े के रूप में मनाया जाता है। मुजीब ने कहा कि गांधी जानते थे कि देश को आजादी तो एक ना एक दिन मिल ही जाएगी, लेकिन भारत देश की सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक संस्कृति को यहां की मिलीजुली तहजीब को सहेज कर रखने वाली कोई शक्ति है तो वह भाषा हिंदी की शक्ति है। इसी के माध्यम से दिलों को जोड़ कर रखा जा सकता है।

उन्होंने आजादी की अभिव्यक्ति को देश की आजादी का रास्ता माना और इसी रास्ते को तय करके आजादी हासिल की। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान निदेशक डॉ. सोलत अली खान ने की। उन्होंने कहा कि हिंदी दिलों को जोडऩे वाली भाषा है। हृदय से बोले जाने वाली भाषा का नाम हिंदी है।

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