अस्सी किलो की फुटबॉल को धकेलेंगे बारहपुरा के सात हजार खिलाड़ी, युवा आज दिखाएंगे दमखम

अस्सी किलो की फुटबॉल को धकेलेंगे बारहपुरा के सात हजार खिलाड़ी, युवा आज दिखाएंगे दमखम

pawan sharma | Publish: Jan, 14 2018 09:05:55 AM (IST) Tonk, Rajasthan, India

एक महीने से दड़ा बनाने की तैयारी चल रही है। इसमें पत्थर, टाट इत्यादि डाल कर रस्सियों से इस कदर गूंथा जाता है।

 

 आवां. रिश्तों में मिठास और दिलों मे प्यार घोलने वाला दड़ा महोत्सव रविवार को आयोजित किया जाएगा। राजपरिवार व पंचायत प्रशासन की ओर से इसकी व्यापक तैयारियां की गई है। गढ़ पैलेस में कारीगरों ने दड़े को अन्तिम रूप देकर इसे और वजनी बनाने के लिए एक दिन पूर्व ही पानी में डाल दिया।

 

 

मकर संक्रान्ति के पर्व पर आवां के गोपाल चौक में लगभग तीन घण्टे चलने वाले ग्रामीण अंचल के इस खेल में रंग-भेद है ना जात-पात की खाई। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के धमाल के साथ अस्सी किलो की फुटबॉल पर 7 हजार खिलाड़ी जोर-आजमाइश का नजारा पेश करते हैं।

 

 

राज घराने के आदित्य सिंह ने बताया कि समाज के सभी तबकों के लोगों की ओर से पे्रम व सौहार्द से खेले जाने वाला दड़े का यह खेल भाईचारे को बढ़ाने के साथ देश की एकता और अखण्डता के लिए मिसाल बनता आया है। रियासत कालीन समय में सेना में भर्ती का कारक बना खेल गौरवमय संस्कृति को संरक्षण देने के साथ परम्परा व विरासत का नवपीढ़ी में संचार कर रहा है।

 

 

किसी खिलाड़ी के नीचे गिरने पर खेल रोक कर उसे उठाने की परम्परा ने इस खेल को सदियों से जीवित रख पर्यटन क्षेत्र में निरन्तर ख्याति पाई है।
कारीगर नारायण सिंह, रामकिशन मीना आदि ने बताया कि लगभग एक महीने से दड़ा बनाने की तैयारी चल रही है। इसमें पत्थर, टाट इत्यादि डाल कर रस्सियों से इस कदर गूंथा जाता है।

 

 

देश-भर में अनोखे अन्दाज में खेले जाने वाला यह खेल परिणाम में अकाल-सुकाल का संदेश देने के कारण भी आवां सहित बारहपुरों के बाशिन्दों की मूंछ का सवाल बन जाएगा। आवां सहित बारहपुरों के लोग दो खेमों मे बंट दड़े पर इस कदर पिल पड़ते हैं कि पसीने से तरबतर होने के साथ बदन के कपड़े भी तार-तार हो जाते हैं।

 

 

मान्यता के अनुसार दड़े पर पैर लगाना शुभ व स्वास्थ्य वर्धक माना गया है। इसके लिए हर कोई आतुर नजर आता है। खेल शुरू होने से पहले ही दर्शक दीर्घा बने गोपाल मंदिर , विद्यालय भवन व आसपास के मकानों की छतें लोगों से ठसाठस भर जाती हंै।

 

 

खेल मैदान बने ग्राम के बीच गोपाल चौक की रोनक दोपहर तक परवान छूने लगती हैं। यहां का नजारा दिलकश व दिलों की धडकऩे बढ़ाने वाला होता जाता है। आसमान में पतंगें उडऩे के साथ खेल चलने तक खिलाडिय़ों के जूते-चप्पल के साथ यदा-कदा सिरों की पगडिय़ां भी उछलती नजर आती है।

 

 

सजे-धजे आवां में दूनी, चांदली सहित बारहपुरों की सडक़ें संक्राति के दिन सुबह से ही गुलजार हो जाती है। रंग-बिरंगी विभिन्न राजस्थानी पोशाकें पहने युवतियां व धोती-कुर्ते और पगड़ी धारण किए नौजवानों की आवाजाही खेल की रोनक पर चार-चांद लगा देती है।
(रिपोर्ट-मधुबाला स्वर्णकार)

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