कविता : मेरा जलता है माथा, मन की शीतलता में आग लग जाती हैं

मेरा जलता है माथा, मन की शीतलता में आग लग जाती हैं, हथेलियों से आंखें ढक जाती हैं...

By: pawan sharma

Published: 03 Jul 2021, 05:58 PM IST

मेरा जलता है माथा
मन की शीतलता में आग लग जाती हैं
हथेलियों से आंखें ढक जाती हैं
पलकें हो जाती हैं नम
पीता रहता हूं गम
जब गरीबी की पीठ पर
एक कागज़ का टुकड़ा
चाबुक लगा जाता है
मानवता को धकेल कर
आगे बढ़ जाता है
इस अनुभूति के अनेक दीप
युग . युगांतर से जल रहे हैं
पर विस्मय कि निरंतर
अंधकार बढ़ रहा है
अंधेरे पल रहे हैं
ओ आद्यन्त रहिता धरती मां!
तू ही बता
पूर्ण प्रकाश कब उतरेगा
विश्व के आंगन में
कब मानवता का सूरज निकलेगा
और कब निर्धन श्रमिकों के भाल
उसकी किरणों से चमकेंगे
कितना उल्लास और आनंद होगा तब
मां इतना तो बता दो कि वह स्वर्ग पृथ्वी पर उतरेगा कब

मेरा जलता है माथा
मन की शीतलता में आग लग जाती हैं
हथेलियों से आंखें ढक जाती हैं
पलकें हो जाती हैं नम
पीता रहता हूं गम
जब गरीबी की पीठ पर
एक कागज़ का टुकड़ा
चाबुक लगा जाता है
मानवता को धकेल कर
आगे बढ़ जाता है
इस अनुभूति के अनेक दीप
युग . युगांतर से जल रहे हैं
पर विस्मय कि निरंतर
अंधकार बढ़ रहा है
अंधेरे पल रहे हैं
ओ आद्यन्त रहिता धरती मां!
तू ही बता
पूर्ण प्रकाश कब उतरेगा
विश्व के आंगन में
कब मानवता का सूरज निकलेगा
और कब निर्धन श्रमिकों के भाल
उसकी किरणों से चमकेंगे
कितना उल्लास और आनंद होगा तब
मां इतना तो बता दो कि वह स्वर्ग पृथ्वी पर उतरेगा कब


रचयिता .. पं अक्षय बोहरा अभय
पालुकों का मोहल्ला पुरानी टोंक

pawan sharma
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