नेपाल के नमदे से मुकाबला, टोंक को चाहिए सम्बल

देश-विदेश में नमदा उद्योग के नाम से टोंक की पहचान है, लेकिन बदलते परिवेश में यहीं उद्योग सरकारी संरक्षण के अभाव में अब हांफने लगा है।

By: Vijay

Published: 22 Sep 2021, 06:30 PM IST

विजय जैन

टोंक. देश-विदेश में नमदा उद्योग के नाम से टोंक की पहचान है, लेकिन बदलते परिवेश में यहीं उद्योग सरकारी संरक्षण के अभाव में अब हांफने लगा है। करीब 15 हजार से अधिक लोगों के रोजगार का जरिया रहा नमदा अब चार-पांच हजार लोगों तक सिमट गया है।


अमरीका, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, युरोप में पहचान बना रहे टोंक के नमदा उद्योग पर अब प्रतिस्पर्धा के दौर में नेपाल भारी पडऩे लगा है। कीमतों में अंतर होने के कारण इन देशों में अब वहां के लोग नेपाल का नमदा अधिक खरीदने लगे हैं।

पांच पीढ़ी से नमदा उद्योग से जुड़े अब्दुल हफीज ने बताया कि नेपाल में मजदूरी की दर भारत से काफी कम है एवं कच्चा माल आसानी से मिलने के साथ ही वहां की सरकार भी सहयोग कर रही है।

जबकि यहां मजदूरी की दर अधिक होने के साथ ही कच्चा माल मिलने में परेशानी होती है, साथ ही दो दशक में अब तक सरकार स्तर पर किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं मिला है। कच्चा माल लेने के लिए भी रेगिस्तानी जिले बीकानेर, बाड़मेर, जैसलमेर एवं जोधपुर की ओर जाना पड़ता है।

समय के साथ हुआ बदलाव
करीब दो-तीन दशक पहले नमदा उद्योग में मात्र पैरदान, बिछौना व चप्पल ही बनाई जाती थी, जो सीजन के अनुसार बिकती थी। अब अन्तराष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुसार क्रिसमस ट्री, सांता क्लॉज कपड़े, खिलौने, पैरदान, शूज, बैग के साथ कई प्रकार के सजावटी सामग्री बनाई जाती है। किसी भी प्रकार का साइड इफैक्ट नहीं होने के कारण यह आसानी से बिक जाते हंै।

कारीगर हो रहे हैं कम: व्यवसाय से जुड़े शहाबुद्दीन ने बताया कि 5 दशक पहले तक शहर के अधिकतर घरों में इसका काम होता था। अब महज 60-70 परिवार ही रह गए हैं जो इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। प्रतिस्पद्र्घा बढऩे से इसमेे मुनाफा लगातार कम होता जा रहा है। हालांकि पुरानी टोंक में कई स्थानों पर नमदा बनाने का काम आज भी बदस्तूर जारी है। दूसरा कारण है कि सिंथेटिक व्यवसाय ने भी इसको नुकसान पहुंचाया है।

पहले चालीस, अब छह
जिले में दो दशक पहले नमदा उद्योग की करीब चालीस इकाइयां लगी हुई थी, जिनसे 15 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ था तथा लोग भेड़ पालन के प्रति जागरूक थे। समय के साथ सरकार सहयोग नहीं मिलने से लोगोंं का इससे रुझान घटने के साथ ही इकाइयां बंद होने लगी। अब जिला मुख्यालय पर मात्र छह इकाइयां ही संचालित है, जिनसे चार हजार को रोजगार मिला है।

सीधे तौर पर नमदा उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए कोई योजना नहीं है। मिशन निर्यातक बनो के तहत नमदा उद्योग संचालकों को जोड़ा जाएगा, जिनसे उन्हें अधिक लाभ मिले।
शैतान सिंह, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केन्द्र, टोंक

Vijay Bureau Incharge
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