scriptThe sweetness of Tonk Banas melons has reduced | दिल्ली तक महकने वाले टोंक बनास के खरबूजों की मिठास हुई कम | Patrika News

दिल्ली तक महकने वाले टोंक बनास के खरबूजों की मिठास हुई कम

बनास की कोख से पैदा होकर लोगों को मिश्री जैसा जायका देने वाला खरबूजा बीते करीब 20 वर्षों से साल दर साल लुप्त हो जा रहा हैं।

टोंक

Published: May 02, 2022 05:33:38 pm

निवाई. बनास की कोख से पैदा होकर लोगों को मिश्री जैसा जायका देने वाला खरबूजा बीते करीब 20 वर्षों से साल दर साल लुप्त हो जा रहा हैं। जिसके पीछे प्राकृतिक प्रकोप के साथ-साथ बीसलपुर बांध से पर्याप्त पानी नदी में नहीं छोड़ा जाता है। जिससे बनास की लगभग 300 किलोमीटर तक में फैली उत्पात पट्टी नेगडिय़ा से ईसरदा, शिवाड़ तक बनास खरबूजे, ककड़ी, टमाटर आदि बेकार हो गए हैं।
दिल्ली तक महकने वाले टोंक बनास के खरबूजों की मिठास हुई कम
दिल्ली तक महकने वाले टोंक बनास के खरबूजों की मिठास हुई कम
इसके चलते खरबूजों के साथ-साथ तरबूज, खीरा, प्याज का उत्पादन भी घट चुका हैं। दरअसल पट्टी के लिए पानी की कमी के साथ-साथ उर्वरक शक्ति कम हो गई है। इसका उत्पादन घटने से फसल पर निर्भर करीब 3 हजार परिवारों को पिछले 20 सालों से 20 से 25 करोड़ रुपए का नुकसान उठाने को विवश होना पड़ा।
कीर, कहार, धाकड़, माली, लोधा, धोबी, गुर्जर जाति के लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। इनमें कीर जाति के लोग इस उद्योग से गहराई से जुड़े हुए हैं। फसल के मौसम में यह लोग 4-5 माह तक अपने घरों को छोड$कर नदी में रहते थे, लेकिन लगातार होती कम पैदावार के चलते इन लोगों का अब इस खेती से मोह भंग होता नजर आ रहा हैं। वैसे तो खरबूजे की फसल का उत्पादन कम होने के पीछे अनेक कारण हैं, लेकिन जब से जिले में बीसलपुर बांध का निर्माण हुआ है।
तब से बनास नदी में होने वाली फसल पर सबसे अधिक असर पड़ा है। क्षेत्र का जल स्तर जमीन में 200 से 250 फीट तक नीचे चला गया है। फलस्वरूप जिले के छावनी, गहलोद, फूल बाग, मोती डूंगरी, सईदाबाद, सरवराबाद, कंकराज, खेड़ा, मेहन्दवास, नया गांव देवली क्षेत्र के राजमहल बोरड़ा, छातड़ी सहित सैकड़ों गांवों में आय का स्त्रोत्र बना बनास के खरबूजे अब उत्पादन नहीं होने के कारण लोगों की परेशानी का कारण बन गया है।
उत्पादन के अभाव में आज बनास का मिश्री सा स्वाद देने वाला खरबूजे के नाम पर बिकने वाला फल दिल्ली, पंजाब, चण्डीगढ़, जयपुर तथा अजमेर भी बेहद मांग होने के उपरान्त भी नहीं पहुंच रहा है।
वैसे तो खरबूजा की अनेक किस्म प्रचलित है, लेकिन इनमें गोल्या, खरडिय़ा, फूट एवं नीली धारी के होते हैं। इनमें दिसावरी में सबसे अधिक मांग गोल्या खरबूजे की होती थी। गोल्या जहां मिश्री धार स्वाद की तरह मीठा एवं जायकेदार होता था।

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