खेतों में दौड़ कर युवाओं ने लावा को दिलाई प्रदेश में पहचान

हॉकी की नर्सरी है लावा
300 से अधिक राज्यस्तरीय, 50 से अधिक राष्ट्रीय खिलाड़ी, अभाव भी नहीं रोक पाया राह

जलालुद्दीन खान

टोंक. प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। समर्पण, मेहनत और लगन से किसी भी मंजिल को पाया जा सकता है। इसी ध्येय वाक्य को अंगीकार कर लावा के युवाओं ने प्रदेश में नाम रोशन किया है। लावा गांव जिले में खेलकूद के क्षेत्र में अहम स्थान रखता है।

By: jalaluddin khan

Updated: 03 Apr 2021, 09:06 PM IST

खेतों में दौड़ कर युवाओं ने लावा को दिलाई प्रदेश में पहचान
हॉकी की नर्सरी है लावा
300 से अधिक राज्यस्तरीय, 50 से अधिक राष्ट्रीय खिलाड़ी, अभाव भी नहीं रोक पाया राह

जलालुद्दीन खान
टोंक. प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। समर्पण, मेहनत और लगन से किसी भी मंजिल को पाया जा सकता है। इसी ध्येय वाक्य को अंगीकार कर लावा के युवाओं ने प्रदेश में नाम रोशन किया है। लावा गांव जिले में खेलकूद के क्षेत्र में अहम स्थान रखता है।


वर्तमान में यहां के दर्जनों युवा शारीरिक शिक्षक हैं, जो प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रतिभाएं तराश रहे हैं। जानकारी अनुसार लावा गांव टोंक जिले में खेल गांव व हॉकी की नर्सरी के रूप में प्रसिद्ध है।

यहां राज्यस्तरीय व राष्ट्रीय स्तर के 300 से अधिक खिलाड़ी हैं, जिनमें 40 से अधिक युवा राजकीय विद्यालयों में शारीरिक शिक्षक पद पर कार्यरत हैं। इन युवाओं ने बिना संसाधन संघर्ष के दम पर यह मुकाम हासिल किया है।


ग्रामीणों ने उपलब्ध करवाई सुविधाएं
स्थानीय खिलाडियों ने बताया कि गांव की स्कूल में खेल संसाधनों व सुविधाओं का अभाव था, लेकिन ग्रामीणों के सहयोग से युवा खिलाडियों ने मंजिल पाई।

खेलों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार की ओर से शुरू की गई 10 हजार रुपए की इनामी राशि प्रतियोगिता में लावा की हॉकी टीम लगातार तीन बार चैम्पियन रही। वहीं इसी योजना में एक बार वॉलीबॉल की टीम भी विजेता रही है।


मिनी खेल स्टेडियम की दरकार
ग्राम पंचायत क्षेत्र में मिनी खेल स्टेडियम होना चाहिए। इसके अभाव में युवाओं को सड़कों व खेतों पर तैयारी करनी पड़ रही है।

नियमित अभ्यास करने वाले अक्षय, गणेश, सुरेश सहित अन्य युवाओं ने बताया कि सरकारी स्कूल का खेल मैदान भी पूर्ण सुविधायुक्त नहीं है। वर्तमान में भी हर रोज सुबह व शाम को क्षेत्र के 30 से 40 युवा सड़क पर दौड़ लगाते और अन्य अभ्यास करते नजर आते हैं।

कुछ युवा मुख्य सड़क पर तो कई युवा कच्चे रास्तों पर ही अभ्यास करते हैं। गांव की मुख्य सड़क पर वाहनों का आवागमन रहता है।


तालाब से शुरू हुआ सफर
गांव में तीन दर्जन से अधिक तैराकी के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं, लेकिन उन्होंने यह तमगा संसाधनों का अभाव होने के बावजूद हासिल किया है।

राष्ट्रीय तैराक और शारीरिक शिक्षक लालचंद ने बताया कि गांव में तैराकी के लिए कोई स्वीमिंग पूल नहीं था, बारिश के दिनों में जब यहां के तालाबों में पानी भरता तो सुबह-शाम दर्जनों खिलाड़ी अभ्यास के लिए पहुंचते। जब यहां पानी खत्म हो जाता तो दूर दराज बांधों में अभ्यास के लिए पहुंचते।

तीरंदाजी के लिए राजधानी की राह
लावा में छह से अधिक राष्ट्रीय तीरंदाज भी हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थियों में प्रदेशभर में नाम कमाया है। राष्ट्रीय खिलाड़ी बुद्धिप्रकाश ने बताया कि तीरंदाज बनने की इच्छा थी, लेकिन उसके लिए यहां संसाधन नहीं थे।

एक धनुष की कीमत एक से दो लाख रुपए के बीच होती है जो साधारण परिवार के खिलाड़ी के लिए दूर की कौड़ी साबित होती है। बुद्धिप्रकाश ने बताया कि जयपुर में किराए के कमरे में रहकर अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी लिंबाराम के सान्निध्य में तीरंदाजी सीखी।


बबूल की लकड़ी काटकर बनाई स्टिक
हॉकी में लावा गांव ने जिले में अलग ही पहचान बनाई है। यहां जिले के सर्वाधिक राज्य स्तरीय हॉकी खिलाड़ी हैं। गांव हॉकी की नर्सरी के रूप में प्रसिद्ध रहा है। यहां करीब 125 से अधिक राज्य स्तरीय हॉकी खिलाड़ी हैं।


वरिष्ठ हॉकी खिलाड़ी व डिग्गी राजकीय माध्यमिक स्कूल में शारीरिक शिक्षक चन्द्रप्रकाश शर्मा ने बताया कि उनके दौर में न तो खेल मैदान था और न ही संसाधन।

उनका कहना है कि स्कूल में स्टिक नहीं होती थी, लेकिन हॉकी के प्रति जूनून ऐसा था कि पेड़ों से स्टिकनुमा लकडियां काटकर खेला करते थे। उबड़-खाबड़ खेल मैदान को समतल करने के लिए 10-10 घंटे फावड़े लेकर जुटते थे।

jalaluddin khan Reporting
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned