टूट गई ढाई सौ साल से चली आ रही दड़ा खेलने की परंपरा

आवां कस्बे में गुरुवार को मकर संक्रांति पर ढाई सौ बरसों से चली आ रही दड़ा खेलने की परंपरा कोरोना के चलते इस बार टूट गई।

By: santosh

Updated: 14 Jan 2021, 03:42 PM IST

आवां। कस्बे में गुरुवार को मकर संक्रांति पर ढाई सौ बरसों से चली आ रही दड़ा खेलने की परंपरा कोरोना के चलते इस बार टूट गई। राज्य सरकार द्वारा घोषित कोविड-19 के नियमों की पालना करते हुए दड़े के खेल का आयोजन करने वाले पूर्व राज परिवार ने इस बार दड़ा महोत्सव नहीं मनाने की जानकारी सरपंच दिव्यांश महेंद्र भारद्वाज को दे दी थी, जिसकी घोषणा सरपंच ने पहले ही कर दी थी।

दड़े का खेल नहीं होने से हजारों लोगों से खचाखच भरा रहने वाला गोपाल चौक भी इस बार वीरान रहा और वहां गोवंश व बच्चे चहलकदमी करते नजर आए। आसपास के बारह पुरो के युवक और युवतियां रंग बिरंगी पोशाकें पहनकर सज धज कर दड़े का खेल देखने आए, लेकिन गोपाल चौक में आकर उन्हें मायूस होकर वापस लौटना पड़ा। कस्बे के 80 वर्षीय बुजुर्ग राधेश्याम चतुर्वेदी ने बताया कि आवां में दड़ा खेलने की परंपरा लगभग ढाई सौ वर्षों से चली आ रही है। इस बार कोरोना संक्रमण के चलते इस परंपरा के टूटने का बहुत दु:ख है।

इस दौरान कुछ शरारती बच्चों ने दड़ा बनाकर गोपाल चौक में रख दिया। गांवों से आए युवक युवतियां इस दड़े के दर्शन कर ढोक लगाते भी देखे गए। दड़े का खेल नहीं होने से आवां में मकर संक्रांति का उत्सव अधूरा रहा। कस्बे और आसपास के बारह पुरों के लोग दड़ा महोत्सव नहीं होने से मायूस नजर आए। गौरतलब है कि दड़े के खेल से हजारों किसानों की आशा बंधी रहती थी, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि दड़ा अकाल और सुकाल का संकेत भी देता था। इस दौरान कस्बे में बच्चे व युवक दिन भर छतों पर पतंगबाजी करते नजर आए और सारा आसमान ये काटा वो काटा के शोर से गुंजायमान रहा।

Show More

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned