अगर आप भोजन में धनिये का इस्तेमाल कर रहे हैं तो हो जाएं सावधान

अगर आप भोजन में धनिये का इस्तेमाल कर रहे हैं तो हो जाएं सावधान

kamlesh sharma | Updated: 09 Oct 2019, 05:04:34 PM (IST) Udaipur, Udaipur, Rajasthan, India

अगर आप भोजन में धनिये का इस्तेमाल कर रहे हैं तो सावधान हो जाएं क्योंकि मिलावट इतने सक्रिय हो गए है

उदयपुर। अगर आप भोजन में धनिये का इस्तेमाल कर रहे हैं तो सावधान हो जाएं क्योंकि मिलावट इतने सक्रिय हो गए है कि वे धनिये की हू—ब—हू दिखने वाली पत्तियों के साथ गाजर घास की पत्तियों के साथ गाजर घास की पत्तियां मिलकर बेच रहे है। इतना ही नहीं पशु आहार के रूप में काम आने वाले रिजके में भी यह धड़ल्ले से आ रहा है। चिकित्सकों के अनुसार यह गाजर घास काफी घातक है। इसके परागकरण लोगों को चपेट में लेते हुए एलर्जी, अस्थमा व जुखाम के रोगी बना रहे है। उदयपुर में खुले पड़े भूखंड व नदी—नालों किनारे बहुतायत में गाजर घास उगी पड़ी है, जो बीमारी का घर कर रही है। चिकित्सकों व पर्यावरणविदों ने प्रशासन व आमजन से अपील की कि वे धनिये की जांच के साथ ही आसपास लगे गाजर घास को जड़ मूल से खत्म कर लोगों को बीमारी से बचाएं।

घातक है गाजरघास
वर्तमान में शहर में कई स्कूल, कॉलेज परिसर, हॉस्टल, खाली पड़े भूखंड के साथ ही एमबी चिकित्सालय परिसर में भी काफी मात्रा में गाजर घास उग रही है। इसकी चपेट में आने से कई लोग बीमार हो रहे हैं। सर्वाधिक इसका फैलाव खाली पड़े भूखंडों में हो रहा है। हाल ही में धनिये व रिजके की भी कई पूली में इसे देखा गया। गाजरघास पर्यावरण प्रदूषण के साथ ही मनुष्य व जीव जन्तुओं के लिए घातक है।

ऐसे करे रोकथाम
गाजर के छोटे पौधे को जमीन से निकाल कर नष्ट कर देने से पुष्पित अवस्था तक पौधे नहीं पहुंचते हैं। अगर पौधे बड़े हो जाते हैं तो अन्त में जीवनचक्र समाप्ति पर असंख्य बीज बनाते है, इससे हजारों नए पौधे तैयार हो जाते है। नए क्षेत्रों में इसका प्रसार संभव है।

सितम्बर व अक्टूबर में फैलती है
पर्यावरणविदों के अनुसार गाजर घास में पार्थनीन, कैफिन व पीफोमेरिन अम्ल बेनालोन आदि विषाक्त फिनोलिन होते है। जिससे मनुष्य में अनेक रोगों की आशंका रहती है। इस पौधे के परागकण् सितम्बर, अक्टूबर माह में बहुतायत में फैलते हैं, जो श्वास के साथ फेफेड़ों में प्रवेश कार जाते है। इसके सम्पर्क में आने वाले को खास, खुजली व लालदाने हो जाते है। खांसी, जुखाम का कारण हो सकता है, जो अधिक समय रहने पर अस्थमा व दमा का रूप ले सकता है।


कई बीमारियों की जड़
वरिष्ठ चिकित्सक, इएनटी, डॉ राजीव सक्सेना ने बताया कि बदले मौसम व अत्यधिक मात्रा में बरसात के बाद गाजर घास के कई नए पौधे जगह—जगह उग चुके है। अक्टूबर में गाजर घास सर्वाधिक बढ़ती है। इसके परागकण में फैलकर श्वास के अंदर आ जाते हैं। इसकी वजह से नाक में पानी आना, छींके आना, खुजली चलना, आंख में खुलजी गले में खराश होती है और कईयों में अस्थमा का रूप ले लेता है। इससे चर्म रोग, खुलजी एवं एलर्जी की बीमारियां भी होती है। स्वयंसेवी संस्थाओं, प्रशासन व आमजन को चाहिए कि वे सावधानीपूर्वक अभियान चलाकर उसे जुड़मुक्त कर लोगों को बीमारी से बचाएं।

वनस्पतिविज्ञ डॉ. नरेशचन्द्र शर्मा ने बताया कि गाजर घास की उत्पत्ति का स्थान दक्षिण मध्य अमरीका है। भारत में आने के बाद यह विकराल रूप ले चुकी है। प्रशासन को इसकी रोकथाम के भरसक प्रयास करना चाहिए।

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