समझौते के बाद 17 वर्ष से चल रहा विवाद समाप्त

कड़ेचा व सालमपुरा गांव के बीच था चरनोट भूमि पर हरियाली बचाने का विवाद

By: surendra rao

Published: 27 Jul 2020, 05:26 PM IST

उदयपुर.भीण्डर. जिले की भीण्डर पंचायत समिति के वाणियातलाई पंचायत में स्थित चरनोट भूमि की हरियाली बचाने के लिए कड़ेचा व सालमपुरा के बीच 17 वर्षों से चल रहा विवाद रविवार को समाप्त हो गया। इस विवाद को निपटाने में अहम भूमिका भीण्डर थानाधिकारी देवेन्द्र सिंह देवल ने निभाई। इस विवाद को लेकर 18 जुलाई को सालमपुरा गांव के ग्रामीणों ने कड़ेचा गांव के कार्यरत्त नरेगा श्रमिकों पर हमला करते हुए पत्थरबाजी व मारपीट से 17 नरेगा श्रमिकों को घायल कर दिया था। इसके बाद थानाधिकारी देवेन्द्र सिंह देवल ने दोनों ग्रामीणों से चर्चा करते हुए विवाद को समाप्त किया।
फैसले के लिए यह रहे उपस्थित
वाणियातलाई पंचायत के कड़ेचा गांव में स्थित चरनोट भूमि पर हरियाली को लेकर कड़ेचा व सालमपुरा गांव के ग्रामीणों के बीच पिछले 17 वर्षों से विवाद चल रहा था। जिसमें चरनोट भूमि पर सालमपुरा गांव के ग्रामीण अपना हक जताते थे तो कड़ेचा गांव के ग्रामीण अपना हक जताते हुए उक्त जमीन पर हरियाली से आबाद कर दिया था। लेकिन पिछले तीन वर्षों में यह विवाद दोनों गांवों में बहुत ज्यादा बढ़ चूका था। गत 18 जुलाई को सालमपुरा ग्रामीणों ने कड़ेचा गांव के नरेगा श्रमिकों पर हमला कर दिया था। इसके बाद विवाद भीण्डर पुलिस थाने में पहुंचा। इसको लेकर रविवार को दोनों गांव के ग्रामीणों को एकत्रित किया। जहां पर भीण्डर थानाधिकारी देवेन्द्र सिंह देवल, भीण्डर तहसीलदार रामसिंह राव, भीण्डर पंचायत समिति विकास अधिकारी पंकज औदिच्य, वाणियातलाई सरपंच गोवद्र्धन लाल रावत, कुण्डई सरपंच देवीलाल मीणा सहित प्रशासन के आला अधिकारी उपस्थित थे।
बंजर भूमि में हरियाली पैदा करने का बेहतर उदाहरण
वाणियातलाई ग्राम पंचायत के कड़ेचा गांव के निकट करीब 200-250 बीद्या जमीन चरागाह के लिए सरकार द्वारा आरक्षित है। इस जमीन पर वर्ष 2003 में ग्राम पंचायत, स्वयंसेवी संस्थाओं व ग्रामीण के सहयोग से पौधरोपण व चारदीवारी बनाकर इस क्षेत्र को पर्यावरण के लिए संरक्षित की गई थी। ग्रामीणों ने पौधों की रक्षा करने का संकल्प लेकर इस क्षेत्र में अपने पशुओं को घास खाने के लिए नहीं भेजते थे। इसके बाद इसके चलते पिछले 17 वर्षों में चारागाह के लिए आरक्षित भूमि में हरियाली ही हरियाली व्याप्त हो गई और प्रकृति का एक नायाब उदाहरण बन गया। लेकिन यह हरियाली पड़ोसी गांव के सालमपुरा गांव के ग्रामीणों को रास नहीं आईं और प्रतिदिन हरियाली को नुकसान पहुंचाते हुए जमीन पर कब्जे कर रहे थे। इसको लेकर कड़ेचा गांव के ग्रामीणों ने रोकने के लिए अपने स्तर पर किए प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली तो पिछले वर्ष प्रशासनिक कार्यवाई करते हुए जमीन पर कड़ेचा गांव की ही निकली। पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य हो रहा हैं और यहां ग्रामीणों ने 17 वर्ष से मेहनत करके चारागाह के लिए आरक्षित कर रखे पहाडिय़ों को हरियाली से भर दिया आज वह बचाने के लिए संघर्ष करते आ रहे थे। लेकिन आज दोनों गांवों में समझौता होने के साथ 17 वर्ष पूराना विवाद समाप्त हो गया।
यह रहा फैसला
आला अधिकारी एवं ग्रामीणों के बीच करीब 4 घंटे चर्चा चलने के बाद दोनों गांवों में विवादित मामले को लेकर आपसी समझौता किया। जिसमें तय किया गया कि विवादित भूमि में कड़ेचा गांव के ग्रामीण पौधरोपण करके हरियाली को संरक्षित करते आ रहे हैं उसको करते आएंगे और उसको सालमपुरा ग्रामीण हरियाली को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। वहीं हरियाली को संरक्षित करने के लिए बना रखी चारदीवारी को नुकसान नहीं किया जाएगा। इसके साथ सालमुपरा गांव के लिए तय की गई जमीन पर ग्रामीण अपने पशुधन को घास के लिए छोड़ सकेंगे। इस जमीन पर अवैध कब्जा नहीं करेंगे।

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