कोरोना संक्रमित लोगों में बनने लगी है एंटीबॉडी, लेकिन रूप बदल वायरस लौटा तो सुरक्षा कवच नहीं

- आरएनटी मेडिकल कॉलेज की मल्टी डिस्प्लिनरी रिसर्च यूनिट कर रही इस पर काम
- सामान्यतया नहीं होती जांच, केवल प्लाज्मा के लिए होती थी जांच

By: bhuvanesh pandya

Published: 27 Jun 2021, 08:25 AM IST

भुवनेश पंड्या

उदयपुर. कोरोना संक्रमित लोगों में अब एंटीबॉडी बनने लगी है। ये एंटीबॉडी उस वायरस से लड़ती है, जिससे व्यक्ति फिर संक्रमित नहीं होता। यदि वायरस म्यूटेंट यानी बदलकर हमला करे तो वह एंटीबॉडी इस वायरस के नए रूप से सुरक्षा नहीं करती। कई कंपनियां अपने किट के माध्यम से इसकी जांच करती हैं, लेकिन लेवल अलग-अलग आते हैं।
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एंटीबॉडी टेस्ट- ये पता लगाने के लिए होता है कि वह व्यक्ति कोरोना या अन्य संक्रमण का शिकार हुआ है या नहीं। भले ही वह बीमार या नहीं, लक्षण हो या नहीं, यदि जांच में एंटीबॉडी पॉजिटिव आ जाए तो वह कोरोना संक्रमित हुआ है। यदि नेगेटिव आता है तो इसके दो कारण हो सकते हैं, या तो उसमें एंटीबॉडी नहीं बनी या वह कोरोना संक्रमित नहीं हुआ।
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ऐसे बनती है एंटीबॉडी
- जिन लोगों ने कोरोना को हरा दिया है, उनके शरीर में एंटीबॉडी बन जाती हैं। शरीर की इम्यूनिटी किसी भी बैक्टीरिया, वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। ये एंटीबॉडी एक विशेष तरह की प्रोटीन होती है और यह शरीर का वायरस से बचाव करती है।

- एंटीबॉडी दो तरह की होती है, आईजीएम व आईजीजी। संक्रमण के 4-5 दिन में आईजीएम का निर्माण होता है, वहीं 14 दिन बाद आईजीजी बनती है। आईजीएम एक से डेढ़ माह में समाप्त हो जाती है, आईजीजी एक से डेढ वर्ष या अधिक समय तक रहती है।
इनका कहना है

बच्चों में एमआईएस, मल्टी सिस्टम इन्फ्लामेट्री सिन्ड्रोम कोरोना से ठीक होने के 15 दिन बाद होता है। तेज बुखार, आंखें लाल, शरीर पर दाने व बीपी डाउन होना, उल्टी-दस्त, ब्लड प्रेशर, हार्ट की मांस पेशियों में संक्रमण लक्षण है। इसके उपचार के लिए बच्चों में एंटीबॉडी टेस्ट करवाते हैं। आरएनटी मेडिकल कॉलेज की मल्टी डिस्प्लिनरी रिसर्च यूनिट इस पर काम कर रही है।
डॉ लाखन पोसवाल, प्राचार्य आरएनटी

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दो प्रकार की जांच

- केमील्यूमिनिसेंस- इससे एंटीबॉडी की मात्रा मालूम चल जाती है।
- एलाइजा मेथड - कार्ड टेस्ट होता है, इससे पता चलता है कि पॉजिटिव है या नेगेटिव।

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टीके के बाद एंटीबॉडी की मात्रा अलग

वैक्सीनेशन के बाद हर व्यक्ति के शरीर में बनी एंटीबॉडीज की मात्रा अलग हो सकती है। ऐसे में लोग खुद की सुरक्षा को देखने के लिए यह एंटीबॉडी टेस्ट करवाकर जानना चाहते है। यदि एंटीबॉडी बनती है तो ये सामने आ जाता है कि जो कभी पॉजिटिव नहीं आए, वह एसेम्प्टोमेटिक होकर पॉजिटिव है।
डॉ. कीर्तिसिंह, पीएसएम विभागाध्यक्ष व सीनियर प्रोफेसर

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पोस्ट वैक्सीनेशन के लिए महत्वपूर्ण

पोस्ट वैक्सीनेशन के लिए यह महत्वपूर्ण है। हर कंपनी ने समय तय कर रखा है। छह माह व साल भर तक इसे आका जाता है। मरीज को तीन व छह माह बाद एंटीबॉडी जांच कर परखा जा सकता है। आरटीपीसीआर जांच में सात या आठ दिन पॉजिटिव रहता है तो एंटीजन टेस्ट में 15 दिन। एंटीबॉडी टेस्ट से काफी अन्तराल बाद ये पॉजिटिव होने का पता चल सकता है।
डॉ. अंशु शर्मा, माइक्रोबायॉलोजी लैब प्रभारी आरएनटी

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वायरस के आरएनए का शरीर की सेल में प्रवेश

हर कंपनी अपने हिसाब से किट के माध्यम से लेवल बताती है। कोविड वायरस का स्पाइक प्रोटीन शरीर में होने वाले एसीई टू प्रोटीन से चिपक जाता है, वायरस का आरएनए शरीर की सेल में प्रवेश कर जाता है और फिर लगातार तेजी से बढ़ता जाता है, बढऩे के लिए वह शरीर की ऊर्जा व संसाधनों का उपयोग करता है। आरएनटी की दो मशीनों में एक कट ऑफ वेल्यू यानी पॉजिटिव .8 लेवल के ऊपर होने पर एंटीबॉडी बताता है, तो आईजीजी के लिए एक अन्य कंपनी में 1 से अधिक लेवल पर एंटीबॉडी पॉजिटिव बताती है।
डॉ. सूची गोयल, विभागाध्यक्ष बायोकेमेस्ट्री

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