आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बदलेगी मेवाड़ की दिशा और दशा

- शिक्षक दिवस की दूसरी कड़ी: जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डिम्ड टूबी यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो एसएस सारंगदेवोत से टॉपर्स की बातचीत

By: bhuvanesh pandya

Published: 07 Sep 2021, 06:47 AM IST

भुवनेश पंड्या
उदयपुर. जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डिम्ड टूबी यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो एसएस सारंगदेवोत से उदयपुर स्कूल ऑफ सोशियल वर्क से एमएसडब्ल्यू में अध्ययनरत शुभि चंदनानी व आयुषी राणावत ने बातचीत की। कुलपति सारंगदेवोत ने बताया कि विवि की ओर से किए जा रहे नवाचारों में सबसे महत्वपूर्ण मेवाड़ के 100 गांवों को गोद लेकर वहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से दिशा और दशा में बदलाव करने की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। शिक्षक दिवस की दूसरी कड़ी में प्रो. सारंगदेवोत से बातचीत के प्रमुख अंश....

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प्र. 100 गांव गोद लेने की क्या योजना है ? और क्या-क्या नवाचार हैं ? प्रो.- हम गांव-गांव में थ्रीडी प्रिन्टर के माध्यम से विद्यार्थियों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से वीडियो तैयार कर कैसे प्रतिमाएं बनाते हैं ये स्कूली बच्चों को सिखाया जाएगा, इसके लिए हमने उपकरण ले लिया है, जल्द ही इसे शुरू कर रहे हैं। विवि कई नवाचार कर रहा है, आयुर्वेद चिकित्सालय को मान्यता मिल चुकी है, जल्द ही ही नर्सिंग की पढ़ाई शुरू की जाएगी।

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प्र. नई शिक्षा नीति पर आपका क्या कहना है ?

प्रो.- 1968 में पहली शिक्षा नीति आई थी, इसके चैयरमेन उदयपुर के ही डीएस कोठारी थे। उसमें से ज्यादातर हिस्सा आज भी प्रासंगिक है। इसके 18 वर्ष बाद आई दूसरी शिक्षा नीति में हमने यूरोपियन एज्यूकेशन सिस्टम को वैसा का वैसा लागू किया, इससे हमारी संस्कृति को चोट पहुंची, मैकाले शिक्षा पद्धति का असर पूरे देश में नजर आया, अंग्रेजी को बढ़ावा मिला तो कई लोग हीन भावना से ग्रस्त भी हुए। 1992 में इसमें कुछ बदलाव किए गए, लेकिन फिर भी कमियां रह गई। जिसे मोदी सरकार ने इसे नए सिरे से तैयार किया, जो ड्रॉफ्ट तैयार किया, जिसमें छह लाख लोगों को भेजा गया। ये पॉलिसी अपनी भाषा, संस्कृति व कला को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। 2030 तक 100 प्रतिशत विद्यार्थी को जोडऩा हँै, तो हायर एज्यूकेशन में 26 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जाएगा।

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प्र. कोरोनाकाल में शुरू हुआ ऑनलाइन एज्यूकेशन कि तना कारगर साबित हुआ ?

प्रो. हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इसमें बच्चों की पढ़ाई तो हुई है, लेकिन गलत उपयोग व लगातार काम में लेने से वे कई बार अवसाद में भी गए हैं। शुरुआत में तो बच्चों ने इसे समझना शुरू किया, लेकिन अब बच्चा स्वयं इसमें अभ्यास में आ गया। लर्निंग टिचिंग मैथड का फायदा मिला है। दो साल में बच्चे नियमित पढ़ते रहे, उसका समय खराब नहीं हुआ, ये बहुत बड़ी बात है, इसलिए वह स्वयं को पिछड़ा या कमजोर महसूस नहीं कर रहे, सबसे बड़ी बात है शो मस्ट गो ऑन।

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प्र .जनजाति अंचल के लिए विवि ने क्या किया है ?

प्रो. विद्यापीठ ने दस गांवों को पहले से ही अपने साथ जोड़ रखा है, सलूम्बर, झाडोल, कानपुर, बेदला, नाई, उन्दरी, सराड़ा सहित दस क्षेत्रों में 1937 से विवि ने केन्द्र खोले हैं, कई सफलता की कहानियां गांवों में सामने आई है। ये काम हम सतत कर रहे है। विवि संस्थापक ने 80 वर्ष पहले गांवों के लिए ये सोचा था जो आज भी प्रासंगिक है, हमें गांव के लोगों को हमारे साथ जोडऩा है, जो कमजोर वर्ग के लोग है, उन्हें हमने मुख्य धारा में जोडऩे का प्रयास किया है।

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प्र. कक्षागत ज्ञान के अलावा विवि विद्यार्थियों को प्रेक्टिकल के लिए क्या कर रहा है?

प्रो. हम विद्यार्थियों को प्रेक्टिकल से भी लगातार जोड़े हुए हैं। हमारा एमएसडब्ल्यू करीब आठ वर्ष से भारत की टॉप टेन कोर्स में शामिल है। हम नियमानुसार जिस विषय में पे्रक्टिकल की जरूरत होती है, उसके लिए काम कर रहे हैं, प्रयोगशाला से बाहर गांवों तक हमारी सीधी पहुंच हैं।

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प्र. बाजार में कई शिक्षण एप्स आ गए हैं, परम्परागत शिक्षा के बीच नयापन कैसे स्वीकार सकते हैं ?

प्रो. जीवन में हमें ये उद्देश्य तय करना होगा कि हमें कहा पहुंचना है। उसी शिक्षण पर फोकस करना है, ज्ञान होना जरूरी है, लेकिन जो हमारा लक्ष्य है वह प्राथमिकता के साथ होना चाहिए। अकारण भटकने से कोई लाभ नहीं मिलना है। इसके लिए तय स्तर तक ही हर विद्यार्थी को जुडऩा है। किताबी ज्ञान एप्स से भी ज्यादा फायदेमंद है।

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प्र. विवि व कॉलेजों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ते जा रहे है, आपका क्या कहना है?

प्रो.- बच्चों की समस्याएं समय पर दूर होनी चाहिए, जो-जो कमियां है, उन पर पूरा ध्यान देने की जरूरत है। यदि बच्चों के साथ भेदभाव नहीं होता और अनुशासन बना रहता है। तो ये हालात नहंी होते। कई बार राजनैतिक धड़े व गुटबाजियों का असर बच्चों में नजर आता है, लेकिन यदि प्रशासक बेहतर व पारदर्शी होगा तो ये हाल नहीं होंगे।

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प्र. देश के विवि की रेंक अपेक्षाकृत वैश्विक स्तर पर पिछड़ी हुइ है, क्या कारण है, कैसे बेहतर हो सकता है ?

प्रो. विवि के रेंक को बेहतर बनाने के लिए सतत प्रयास जरूरी है जो पेरामीटर्स है उन पर खरा उतरने के लिए हमें तीन वर्ष में सलेबस में बदलाव, इंडस्ट्री से जुड़ाव, कमजोर बच्चों की अतिरिक्त कक्षाएं, टिचिंग ऑडिट व बदलाव, बच्चे कितना प्रतिशत प्राप्त कर आगे बढ़ रहे हैं, ये सब देखा जाता है। इसमें 221 इंडीकेटर्स है, उस पर हमें खरा उतरना है। विश्वस्तरीय रेंक जो निकाली जाती है, उसमें कई पेरामीटर हास्यास्पद है, वह प्रेक्टिकल नहीं होने से हमारे देश के संस्थान आगे नहीं बढ़ पाते। ये अनुपयोगी दौड़ है। हमें उस ओर ध्यान देने की जरूरत नहीं है।

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