जिंदगी और मौत की जंग के बीच ‘धडकऩे भी गिनी चुनी’

- छह लाख की जनसंख्या पर 245 वेंटिलेटर्स

- लाइफ सपोर्ट सिस्टम का अहम हिस्सा है वेंटिलेटर - जरूरत बढ़ी तो हो सकती है परेशानी

भुवनेश पंड्या

उदयपुर. यहां जिंदगी और मौत की जंग के बीच धडकऩे भी गिनी चुनी सी है। शहर की जनसंख्या छह लाख है, लेकिन पूरे जिले में हमारे पास केवल पौने तीन सौ वेंटिलेटर्स हैं, जबकि कोविड-19 से लड़ी जाने वाली जंग में वेंटिलेटर्स भी बड़ा हथियार है। ये वायरस निमोनिया के बाद सीधे फेंफड़े प्रभावित करता है, मरीज की सांस रोकता है, तब कृत्रिम सांस देने के लिए ये सबसे खास है।

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वेंटिलेटर एक मशीन है जो रोगी को सांस लेने में मदद करती है, इसके लिए मुंह, नाक या गले में एक छोटे से कट के माध्यम से एक ट्यूब श्वास नली में डाली जाती है, इसे मैकेनिकल वेंटिलेशन भी कहा जाता है, यह एक जीवन सहायता उपचार यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम है। मैकेनिकल वेंटिलेशन की जरूरत तब पड़ती है, जब कोई रोगी प्राकृतिक तरीके से स्वयं सांस लेने में सक्षम नहीं होता। इन मशीनों के उपयोग मुख्य रूप से चिकित्सालयों में किया जाता है, मशीन ये काम करती है

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- फेफड़ों में आक्सीजन भेजती है- शरीर से कार्बन डाइआक्साइड निकालती है, जो अपशिष्ट गैस है, जो विषाक्त हो सकती हैं। - लोगों को आसानी से सांस लेने में मदद करती है।

- उन लोगों के लिए स ांस लेना संभव बनाती है, जिन्होंने खुद से सांस लेने की क्षमता खो दी है।

- एक वेंटिलेटर अक्सर कुछ समय के लिए प्रयोग किया जाता है, जैसे सर्जरी के दौरान जब जनरल एनेस्थिसिया दिया गया हो।

- कुछ लोगों को लंबे समय तक या अपने बचे जीवन के लिए वेंटिलेटर का उपयोग करने की जरूरत हो सकती है, इन मामलों में मशीनों का इस्तेमाल चिकित्सलय के बाहर लंबी अवधि की देखभाल सुविधाओं या घर पर किया जा सकता है।

- इससे उपचार नहीं होता केवल सांस लेने में मदद मिलती है।

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आईसीयू में वेंटिलेटर के प्रकार

- दो प्रकार मुख्य है पहला- नेगेटिव प्रेशर वेंटिलेटर: ये रोगी की छाती पर लगाया जाता है, इस फॉर्स या दबाव के कारण छाती उठती और फैलती है, इस प्रकार के वेंटिलेटर आयरन लंग, बॉडी टैंक, चेस्ट कुइरास भी कहे जाते हैं। दूसरा- पॉजिटिव प्रेशर वेंटिलेटर: इसमें मशीन एक सकारात्मक दबाव बनाता है, जो हवा को मरीज के फेंफड़ों में धक्का देता है, इससे इन्ट्रो पल्मोनरी प्रेशर या दबाव बढ़ता है। इसमें तीन प्रकार के पॉजिटिव प्रेशर वेंटिलेटर हैं।

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वाल्यूम साइकिल्ड, पहले से निर्धारित की गई मात्रा या वाल्यूम वितरित होने तक वाुमार्ग पर दबाव बना रहता है, अधिकांश रोगियेां के लिए इस प्रकार के वेंटिलेटर का उपयोग किया जाता है।

-- प्रेशर साइकिल्ड, ये वेंटिलेटर आमतौर पर न्यूमेटिकली पावर्ड होते है, इसमे दबाव सीमा पहले से निर्धारित होती है, वहां तक पहुंचने तक श्वास नली पर सकारात्मक दबाव डालते रहते हैं।

-- टाइम साइकिल्ड, इस प्रकार के वेंटिलेटर में समय पहले से निर्धारित किया जाता है, उस समय तक पहुंचने तक ये वेंटिलेटर सकारात्मक दबाव लगाते रहते हैं, आम तौर पर शिशु के वेंटिलेशन के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

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कैसे काम करता है- वेंटिलेटर एक ट्यूब के माध्यम से रोगी से जुड़ा होता है, यह ट्यूब रोगी के मुंह या नाक या गले में श्वास नली में रखी जाती है, जब स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता इटी ट्यूब को व्यक्ति के वायुमार्ग या श्वास नली में रखता है तो इसे इंटय़ूबेशन कहा जाता है। श्वास ट्यूब को रोगी के नाक या मुंह के माध्यम से ही विंडपाइप या श्वास नली में डाल दिया जाता है, ट्यूब उसके बाद रोगी के गले में आगे खिसकाई जाती है, जिसे एंडोट्राचेल या इटी ट्यूब कहते हैं।

- कभी कभी सांस लेने वाली टय़ूब को ऑपरेशन के जरिए गले में छेद कर रखा जाता है, जिसे ट्रेकियोस्टोमी कहते हैं।

- भोजन की बजाय ट्यूब के माध्यम से रोगी को पोषक तत्व दिए जाते हैं।

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ज्यादा वेंटिलेटर पर रखना भी खतरनाक है, रोगी को वेंटिलेटर एसोसिएटेड निमोनिया, वीएपी हो सकता है। साइनस, फेंफड़ों की बीमारी न्यूमोथोरेक्स भी हो सकती है। खून के धक्के जमने व त्वचा संक्रमण हो सकता है।

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कीमत: पांच से 15 लाख तक के होते हैं।

bhuvanesh pandya Reporting
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