प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट से गूंज

सल्लाड़ा गांव के तालाब में पक्षियों ने डाला डेरा

By: surendra rao

Published: 15 Jun 2021, 06:05 PM IST

सलूम्बर. (उदयपुर).जयसमन्द पंचायत समिति क्षेत्र के सल्लाडा गांव के मध्य बने छोटे से तालाब पर इन दिनों पक्षियों ने डेरा डाल रखा है। यहां एशियन ओपन बिल स्टॉर्क, जल काग, बगुलों का जमावडा़ लगा है। प्रकृति प्रेमी हितेश श्रीमाल में बताया कि इस प्रकार आबादी क्षेत्र में ओपन बिल स्टॉर्क (घोंघिल) का दिखाना और वहां घोंसले बनाना कुछ अलग बात है। इसका प्रमुख कारण इस तालाब के डूब क्षेत्र में कई कांटेदार पेड़ है,ं जो इन पक्षियों के घोंसले बनाने का उपयुक्त स्थान है। साथ ही यहां के पानी में पर्याप्त भोजन (छोटी मछलियां, घोंघे, लार्वा और जलीय जीव) का उपलब्ध होना है। ओपनबिलस्टार्क का मुख्य भोजन घोंघा, मछली, केंचुए व अन्य छोटे जलीय जन्तु हैं। यह एक पानी का मांसाहारी पक्षी है, यह पक्षी जलाशयों, नम भूमियों, एवं नदी की तलहटियों में दिखते हैं। साथ ही पानी में जलीय वनस्पति कमल, सिंघाड़ा, लिली भी है व तालाब का पानी भी स्वच्छ है,ओपन बिल स्टॉर्क मानसून के आगे आगे चलते हैं और उनके आने के कुछ दिनों बाद ही मानसून की शुरुआत हो जाती है। इसकी चोंच बीच से खुली होने के कारण ही इसे ओपन बिल भी कहा जाता है। इस पक्षी का रंग सिलेटी सफेद होता है तथा इसकी पूंछ चमकीले काले रंग की होती है, लंबी और आकर्षक चोंच वाले होते हैं। प्रजनन के बाद ये पक्षी अक्टूबर माह में अपने मूल स्थान पर चले जाते हैं। इनका प्रजननकाल जुलाई से सितंबर है। इस दौरान यह समूह में पेड़ों में घोंसले बनाकर रहते हैं। अक्टूबर के बाद यह तालाब के किनारे या सूनी जगहों पर अलग थलग रहते हैं, इसलिए इनकी मौजूदगी लोगों की नजरों में कम ही आती है। यह पक्षी भारत में काफी संख्या में पाया जाता है। यह पक्षी भोजन की तलाश में स्थानीय प्रवास भी करते हैं। जिसे हर वर्ष अच्छी बरसात की जरूरत होती है। इस पक्षी के प्रजनन का समय जून से दिसंबर तक होता है। इस दौरान मादा पक्षी को आकर्षित करने के लिए नर पक्षी मादा पक्षी को घोंसला बनाने की जगह व घोंसला बनाने की क्षमता प्रदर्शित करता है। जब यह पक्षी घोंसला बनाते हैं तो नर पक्षी घोंसले के लिए जरूरी सामान एकत्रित करता है तथा मादा पक्षी उसे पेड़ पर जांचकर घोंसला बनाती है। इन पक्षियों के घोंसले पानी के बीच में उगे पेड़ अथवा जलाशयों के आसपास खड़े पेड़ों में होते हैं।
यह पक्षी एक पेड़ पर कई घोंसले बनाते है। यह अपने घोंसले मुख्यत: इमली, बरगद, पीपल, बबूल, बांस व यूकेलिप्टस के पेड़ों पर बनाते हैं। एक पेड़ पर 40 से 50 घोंसले तक बना लेते हैं। प्रत्येक घोंसले में 4 से 5 अण्डे होते हैं। सितम्बर के अन्त तक इनके चूजे बड़े होकर उडऩे में समर्थ हो जाते हैं और अक्टूबर में यह पक्षी यहां से चले जाते हैं। चूंकि यह पक्षी मानसून के साथ-साथ यहां आते हैं, इसलिए ग्रामीण इसे बरसात का ***** मानते हैं। गांव वाले इसको पहाड़ी चिडिय़ा के नाम से पुकारते हैं। ये पक्षी जीवनकाल में सिफऱ् एक बार जोड़ा बनाते हैं और जीवन पर्यन्त साथ रहते हैं। एक साथी की मृत्यु के पश्चात ये दूसरा साथी चुन लेते हैं, कभी-कभी इनमें पॉलीगैमी भी देखी गई हैं। प्रजनन काल में दोनों पक्षी बराबर की भूमिका निभाते हैं, घोंसले बनाना, चूजों की भोजन व्यवस्था व सुरक्षा में नर-मादा दोनों की बराबर की भागीदारी होती हैं। इन पक्षियों के मल में फास्फोरस, नाइट्रोजन, यूरिक एसिड आदि कार्बनिक तत्व होने के कारण जिन पेड़ों पर यह आवास बनाते हैं उसके नीचे इनका मलमूत्र इक_ा होकर बरसात के दिनों में पानी के साथ बहकर आस पड़ोस के खेतों की उर्वरकता को कई गुना बढ़ा देता है।

surendra rao Desk
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