इस रिपोर्ट की माने तो राजस्थान में ‘हक’ के लिए आज भी लड़ रहा है दलित वर्ग

इस रिपोर्ट की माने तो राजस्थान में ‘हक’ के लिए आज भी लड़ रहा है दलित वर्ग

Bhagwati Teli | Publish: Jun, 16 2019 05:36:26 PM (IST) | Updated: Jun, 16 2019 05:38:09 PM (IST) Udaipur, Udaipur, Rajasthan, India

एनसीआरबी रिपोर्ट : प्रदेश में गत तीन वर्ष में दर्ज हुए 17 हजार से अधिक दलित अत्याचारों के मामले

उदयपुर . प्रदेश में अपने हक के लिए दलित अब भी लड़ रहा है या यों कहें कि लोगों की सामंती मानसिकता ने अब भी दलित वर्ग को भेदभाव के दलदल में धकेलने का काम कर रही है। देश में दलित अत्याचारों के मामलों में तीसरे स्थान पर रहे राजस्थान में गत तीन वर्षों में 17 हजार से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। आज भी गांवों से शहर तक में दलितों को अपने हक के लिए लड़ाई लडऩी पड़ रही है। सरकार इन अत्याचारों को लेकर पीडि़त पक्षों को तय राशि जरूर देती है, लेकिन फिलहाल ऐसी कोई राह नहीं तलाशी गई जिससे इन अत्याचारों पर विराम लग सके।

संगठनों की कार्ययोजना पर सरकार मौन
जिला स्तर निगरानी कमेटी अत्याचारों पर पैसा स्वीकृत करती है। कानून में 2015 में हुए संशोधन के आधार पर कलक्टर पैसा स्वीकृत करते हैं। 85 हजार से लेकर 8 लाख 25 हजार रुपए तक राशि दी जाती है। जितने भी गंभीर अत्याचार से पीडि़त है, उनके लिए कुछ संगठनों ने एक योजना बनाकर सरकार को सौंपी थी, जिसमें राजस्थान रूल्स 15 के तहत आकस्मिकता योजना बनानी थी, जो अब तक नहीं बनाई गई है। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कमेटी हर जिले में बनी हुई है। इसमें कलेक्टर अध्यक्ष, सदस्य एसपी, एडीएम, विशिष्ट लोक अभियोजक व सामाजिक न्याय अधिकारिता के अधिकारी होते हैं।


ये बोले संगठन
सरकार की प्राथमिकता में दलितों पर हो रहे अत्याचारों का निदान शामिल नहीं है। कानून बने हुए हैं, उन्हें लागू नहीं करना चाहते हैं। उच्च स्तरीय निगरानी एवं सतर्कता कमेटी है, पिछली बार 2012 में बैठक हुई थी। गत सात वर्ष से बैठक ही नहीं हुई। हाईकोर्ट के आदेश 15 जुलाई 2015 को जारी किए गए थे, लेकिन जिला सतर्कता एवं निगरानी कमेटी सभी जगह गठित नहीं है। जिला स्तरीय कमेटी की बैठक प्रति तीन माह में होनी चाहिए लेकिन होती नहीं है। सतीशकुमार, निदेशक, दलित अधिकार केन्द्र जयपुर

हमारा फोकस दलित समुदाय पर अत्याचारों पर है। अत्याचार करने के रूप बदल रहे हैं। पहले की तरह केस आ रहे हैं। जब भी दलित अपने स्वाभिमान के लिए आगे आता है तो कई वर्गों को यह पचता नहीं है, इसलिए अत्याचार कम नहीं हो पा रहे हैं। सुमन दवेठिया, राज्य समन्वयक ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच


15 मई 2017 से पहले जो मुकदमे होते थे, पहले ये ऑफ लाइन थे, अब ऑनलाइन हो गए हैं। प्रत्येक थानाधिकारी को अपनी एसएसओ आईडी से एसजेएमएस पोर्टल पर पीडि़त पक्ष को सहायता के लिए आवेदन दर्ज करना होता है। ऑनलाइन प्रकरण सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के पास जाएगा, वह इसे जांच कर स्वीकृति देगा। इसके बाद वह एडीएम के पास प्रकरण पहुंचता है, जहां से राशि की स्वीकृति जारी होती है। गिरीश भटनागर, उपनिदेशक सामाजिक न्याय अधिकारिता विभाग उदयपुर

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