International Women's Day Special: 12 कीमोथैरेपी का दंश झेल कैंसर को हराया, अब पढ़ा रहीं Fighting With Life का पाठ

International Women's Day Special:  12 कीमोथैरेपी का दंश झेल कैंसर को हराया, अब पढ़ा रहीं  Fighting With Life का पाठ

madhulika singh | Publish: Mar, 07 2017 03:46:00 PM (IST) Udaipur, Rajasthan, India

लगातार 12 कीमो थैरेपी का दंश झेलकर लिम्फोमा कैंसर पर विजय पाकर न केवल अपनी अधूरी पुस्तक को पूरा किया वरन् अब निजी विद्यालय में नन्हे-मुन्नों को राइटिंग स्किल और फाइटिंग विद लाइफ का लेसन पढ़ा रही है दुर्रिया कपासी।

लगातार 12 कीमो थैरेपी का दंश झेलकर लिम्फोमा कैंसर पर विजय पाकर न केवल अपनी अधूरी पुस्तक को पूरा किया वरन् अब निजी विद्यालय में नन्हे-मुन्नों को राइटिंग स्किल और फाइटिंग विद लाइफ का लेसन पढ़ा रही है दुर्रिया कपासी। इनकी पुस्तक 'वन्स अपॉन ए जिनी' 15 मार्च को बाजार में आने वाली है। 


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भारत से करीब साढ़े तीन हजार एयरो मील दूर तंजानिया मूल की दुर्रिया ने बोहरा चैट वेबसाइट पर 2007 में मुलाकात के बाद शहर के युवा जहीर अब्बास से शादी का मानस बना लिया। अनजाने देस में अपनों से कोसों दूर आकर दुर्रिया का साल भर तो हिन्दुस्तानी संस्कृति को समझने में लग गया। इस दौरान एक बेटे को जन्म दिया। अपनी पहली संतान को लाड़-दुलार से पाल-पोसने के बाद जितना समय मिलता वह लेखन में व्यतीत करती।  साल 2014 तक निरंतर लिखने के क्रम ने एक अच्छे खासे उपन्यास (वन्स अपोन ए जिनी) की आधारशिला तैयार कर दी। दरअसल, इस उपन्यास की पूरी रूपरेखा दुर्रिया के मेजिकल वल्र्ड अथवा स्प्रिचुअल अप्रोच को रेखांकित करती है। 


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वो बताती हैं बीमारी के दौरान हर 15 दिनों में ब्लड टेस्ट, छह माह तक कीमो थैरेपी की असहनीय पीड़ा और अब सीने में लगे पोर्ट की मौजूदगी ने कभी ईश्वर के प्रति उसकी आस्था और विश्वास को डिगने नहीं दिया। उल्टे, तकलीफ जितनी बार बढ़ी उस अज्ञात सत्ता के प्रति यकीन दुगुना होता चला गया। जीवन जीने की लड़ाई में जीत का श्रेय दुर्रिया ऊपर वाले को देते कहती भी हैं कि मुश्किल हालातों के दौर में भी कभी नमाज नहीं छोड़ीं। अपने माता-पिता, परिजनों और दोस्तों का शुक्रिया इस बात के लिए अदा करतीं हैं कि उन्होंने हर पल उसकी सलामती की दुआएं कीं। अपने बेटे मोहम्मद अब्बास का इस बात के लिए कि मां के हाथों से ही निवाले खाने वाला यकायक बड़ा और समझदार बन गया। ...और यकीनन अपने हमसफर जहीर को भी इस बात का श्रेय देना नहीं भूलतीं जिसने हर सांस उसके तन-मन की पीड़ा को न केवल महसूस किया बल्कि अपनी हर संभव कोशिशों के दम पर बिछडऩे से बचाए रखा।

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