यहां के किसानों को रास आया जीरा, चार साल में 98 से बढ़ 150 हैक्टेयर में हुई बुवाई

मेनार. दाल-सब्जियों में डाले जाने वाले मसालों का प्रमुख हिस्सा जीरा वल्लभनगर तहसील के किसानों को रास आने लगा है।

Umesh Menaria

November, 2711:31 AM

Udaipur, Rajasthan, India

मेनार. दाल-सब्जियों में डाले जाने वाले मसालों का प्रमुख हिस्सा जीरा वल्लभनगर तहसील के किसानों को रास आने लगा है। हर साल बढ़ रहे बुवाई के आंकड़े इसके गवाह हैं। कृषि विभाग के अनुसार वर्ष 2013-14 में 98 हैक्टेयर, वर्ष 2014-15 में 108 और 2015-16 करीब सवा सौ हैक्टेयर पर यह फसल रही। इस साल बुवाई जारी है और भींडर पंचायत समिति क्षेत्र के कृषि अधिकारी मदनसिंह शक्तावत बताते हैं कि यह 140 से 150 हैक्टेयर तक पहुंच सकती है।

 

अकेले मेनार के किसानों ने अब तक 10 हैक्टेयर पर जीरा बोया है, जबकि नवानिया, खेरोदा, रुंडेड़ा, बांसड़ा सहित आसपास के गांवों में तैयारियां आखिरी दौर में हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि खुले बाजार में 125 से 150 रुपए प्रति किलो के आसपास और शॉर्टेज होने पर इससे भी ऊपर बिकने वाला जीरा किसानों को खासी आमदनी दिला रहा है। यही कारण है कि इसके प्रति दिलचस्पी साल-दर-साल बढ़ रही है।

 

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बुवाई के लिए नवंबर, सिंचाई में फव्वारा विधि सबसे मुफीद

जानकार बताते हैं कि जीरा बुवाई के समय तापमान 24 से 28 डिग्री होना चाहिए, जो अमूमन नवंबर में रहता है। ऐसे में 15 से 30 नवंबर के बीच बुवाई बेहतर है। बढ़वार के समय तापमान 20 से 25 डिग्री तक उपयुक्त रहता है। प्रति हैक्टेयर 12 किलो बीज की बुवाई डेढ़ सेंटीमीटर गहराई पर होनी चाहिए। खाद-उर्वरकों की मात्रा भूमि जांच से तय करनी चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में जीरे के लिए पहले 5 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देनी चाहिए।

 

फिर बुवाई के समय 65 किलो डीएपी व 9 किलो यूरिया मिलाकर डालना चाहिए। पहली सिंचाई पर 33 किलो यूरिया प्रति हैक्टेयर पर छिडकऩा बेहतर है। बुवाई के तुरंत बाद एक हल्की सिंचाई से बीज अस्त-व्यस्त नहीं होती। दूसरी सिंचाई एक हफ्ते बाद करनी चाहिए। इससे अंकुरण अच्छा होता है तथा पपड़ी का अंकुरण पर असर कम पड़ता है। इसके बाद भी जरूरत हो तो 6-7 दिन बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए या 20 दिन के अन्तराल पर दाना बनने तक तीन और सिंचाई करनी श्रेष्ठ है। दाना पकने के समय सिंचाई से बीज हल्का बनता है। आखिरी भारी सिंचाई बीज बनने के समय करनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार एक ही खेत में लगातार तीन साल तक जीरे की फसल नहीं लेनी चाहिए। इससे उखटा रोग का प्रकोप हो सकता है।

 

बाजरा, जीरा, मूंग, गेहूं, बाजरा, जीरा तीन वर्षीय फसल चक्र का प्रयोग किया जा सकता है। मेनार के प्रयोगधर्मी किसान मोतीलाल एकलिंगदासोत बताते हैं कि सरसों और गेहूं के बजाय इस साल चार बीघा पर जीरा बोया है। फसल अच्छी रही तो प्रति हैक्टेयर 8 से 10 क्विंटल पैदावार होगी।

विशेष बोले
पूर्व कृषि पर्यवेक्षक मांगीलाल गिरि बताते हैं कि जीरे की बुवाई के 8 से 10 दिन बाद दूसरी हल्की सिंचाई दें तो जीरे का पूर्ण रूप से अंकुरण होगा। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार जरूरी है। बवस्टीन या मेनकोजेब दवा का 3 ग्राम प्रति किलो बीज उपचार कर बुवाई से भविष्य में फसल में बीमारियों का ***** कम रहेगा। पिछले साल जिस खेत में जीरे की बुवाई की गई थी, उसमें वापस जीरा बोने से इसमें रोग बढ़ सकते हैं।


नकदी फसल का चलन बढ़ा
किसान परंपरागत फसलों को छोडकऱ नकदी फसलों पर प्रयोग कर रहे हैं। सरसों की बुवाई में गिरावट आई है, जबकि वल्लभनगर क्षेत्र में इस साल करीब 150 हैक्टेयर में जीरे की बुवाई का अनुमान है। किसान इस हफ्ते और इसकी बुवाई कर सकते हैं।
मदनसिंह शक्तावत, कृषि अधिकारी, भींडर, उदयपुर

Umesh Menaria
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