video : पेंटिंग का शौक ही बन गया इनकी साधना, रिमोट एरिया में बच्‍चों को भी दी नि:शुल्‍क कला दीक्षा

सुधा खंडेलवाल पेंटिंग के शौक के साथ पिछले 25 बरसों से ससुराल में आनंद से समय व्यतीत कर रही हैं।

rajdeep sharma

December, 1705:54 PM

Udaipur, Rajasthan, India

 

उदयपुर . आजकल के भौतिक युग में अनेक परिवारों में पति-पत्नी दोनों कमाते हैं, तब कहीं जाकर ठीक से गुजारा होता है। जिन परिवारों में महिलाएं घर पर रहकर गृहस्थी संभालती और बच्चों को संस्कारित-शिक्षित करतीं हैं, वहां अक्सर लोग यह आकलन करते देखे जाते हैं कि ये कुछ नहीं करती केवल घर संभालती हैं। गोया कि घर संभालना 'कुछ नहीं करने' की श्रेणी में शुमार होता है। हमारे देश में अधिकांश परिवारों का सामाजिक ढांचा कुछ इस कदर बना हुआ रहता है जहां शादी से पहले लड़कियां जितना लिख-पढ़ जाती हैं और जो मौज-शौक पूरे कर लेती हैं वही उसकी स्थाई पंूजी बनकर रह जाती हैं। बहुत कम बार एेसा देखने में आता है कि शादी के बाद महिलाएं ससुराल की जिम्मेदारियों के साथ अपनी शिक्षा और शौक पूर्ववत् बरकरार रख पाती हैं। बहरहाल, इंदौर से लेकसिटी में ब्याही सुधा खंडेलवाल उन खुशनसीबों में से एक रहीं जिनके साथ वैसा सब नहीं हुआ जिसकी वजह से आज भी वे मायके से साथ आए ठाकुर सेवा-पूजा संस्कार और पेंटिंग के शौक के साथ पिछले 25 बरसों से ससुराल में आनंद से समय व्यतीत कर रही हैं।


सुधा बताती हैं कि शुरू के कुछ साल जरूर नए माहौल और पारिवारिक जिम्मेदारियों की मसरूफियत में बीते, जब नन्हें बेटे-बेटी की परवरिश की प्राथमिकताओं के चलते 'स्वांत सुखाय' प्रयोजन से कला सृजन के लिए माकूल समय नहीं मिल पाया। उस दौरान मेरा सारा ध्यान दोनों बच्चों को पढ़ाने और संस्कार देने के प्रति केंद्रित रहा। हालांकि, जब कभी समय मिलता, रंगों से जरूर खेलती। आज भी वही क्रम बदस्तूर जारी है। अगर कुछ बदला है तो इतना कि बेटा बैंक अधिकारी बन गया है और बिटिया बीबीएम कर अगले लक्ष्य को साध रही है। आगे वे कहती हैं 'इतने बरस जितना कुछ सृजित किया उनमें से अधिकांश चित्राकृतियां आज प्रशंसकों के घर-दफ्तरों की शोभा बढ़ा रही हैं। इस दौरान अनेक स्कूल-कॉलेज विद्यार्थियों को भी सिखाया। गोगुंदा-झाड़ौल जैसे रिमोट एरिया में भी बच्चों को नि:शुल्क कला दीक्षा दीं। उन सबकी दुआओं की बदौलत जितना कुछ बना पाई उन्हीं में से चुनिंदा पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाने की योजना बना रही हंू।'

 

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शौक चढ़ा परवान

होम साइंस में एमए और पेंटिंग-इंटीरियर जैसे विषय में शौक पाले ही सुधा बरसों से कागज-सिल्क और कैनवास पर अपने मनोभावों को उकेर रही हैं। वे बताती हैं 'बचपन से ही कम बोलना, प्रकृति से लगाव और कृष्ण भक्ति प्रिय रहे। आज भी अपने चित्रों में मन की बात रंग-रेखांकन के माध्यम से अभिव्यक्त कर देती हंू। इसके लिए कहीं से विधिवत कला शिक्षा नहीं लीं। हां, पड़ौसी मित्र सुचित्रा के सान्निध्य और प्रेरणा से मिनिएचर इसलिए सीखा कि अपने आराध्य कान्हा को सलीके से उकेर पाऊं। यंू घर-परिवार में रहकर फिजूल वक्त कभी मिला नहीं। लेकिन, सुबह नित्यकर्म के बाद ठाकुरजी की सेवा और दिन में दो से तीन घंटे गैर व्यावसायिक कला साधना के लिए नियत कर रखे हैं। बाकी घर संभालना ही फुलटाइम जॉब है ।

ये है सृजन का दायरा

सुधा ने आइल, एक्रेलिक और वॉटर मीडियम में पोट्र्रेट्स व लैंडस्केप के अलावा हैंडमेड पेपर तथा सिल्क पर पिछवाइयों, फूल-पत्तियों और कृष्ण लीलाओं का चित्रण किया है। इसके साथ उन्हें पेपर मैशी और लवासा मेथड आर्ट बनाना भी बहुत अच्छा लगता है।

artist sudha khandelwal
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