'ऑनलाइन एजुकेशन' के मकडज़ाल में मासूम

छोटी उम्र के बच्चों और अभिभावकों के लिए ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म की तकनीकी समस्याएं, बच्चों के साथ अभिभावकों को भी देना पड़ रहा पूरा वक्त

By: jitendra paliwal

Updated: 02 Aug 2020, 10:59 PM IST

केस-1
नेवैद्या मिश्रा चौथी कक्षा का छात्र है। लॉकडाउन के करीब एक माह बाद उसके स्कूल ने 17 अप्रेल से ऑनलाइन पढ़ाई शुरू करवाई। पहले माइक्रोसॉफ्ट टीम से जोडऩे की कोशिश की, लेकिन तकनीकी कठिनाई के चलते बाद में जूम एप से पढ़ाई शुरू हो सकी।
केस-2
चौथी कक्षा में पढ़ रहे प्रतीक जोशी के ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफॉर्म पर लॉगिन करना और उसके फीचर्स को समझना उसके कर्मचारी पिता और गृहिणी मां के लिए मुश्किल था। तकनीकी जानकार की मदद से लॉगिन तो कर लिया, लेकिन पढ़ाई के वक्त वह अकेला पड़ जाता है।
केस-3
रीया नौवीं कक्षा की छात्रा है। उसके स्कूल ने माइक्रोसॉफ्ट टीम एप पर पढ़ाई शुरू की। लॉगिन की तकनीकी पेचिदगियों के चलते पांच दिन उसकी पढ़ाई शुरू नहीं हो सकी। आखिरकार उसके अभिभावकों ने पड़ोस के जानकार व्यक्ति की मदद से लॉगिन करवाया।
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उदयपुर. ये कुछ उदाहरण हैं ऑनलाइन एजुकेशन के शुरुआती और मौजूदा दौर के। कोरोना की मजबूरी में निजी विद्यालयों ने मुश्किल पढ़ाई के इंतजाम को और ज्यादा दुष्कर बना दिया है। छोटे बच्चों और तकनीक से अनजान अभिभावकों के लिए उन्हें लम्बे समय तक ऑनलाइन पढ़ाई करवाना परेशानी भरा लगने लगा है। अभिभावक बताते हैं कि कई तरह की नई दिक्कतें सामने आने लगी हैं। खासतौर से लॉकडाउन खुलने के बाद कामकाजी दम्पतियों को बच्चों की पढ़ाई के लिए परेशान होना पड़ रहा है। इन दिनों अधिकांश निजी विद्यालय, जूम एप, माइक्रोसॉफ्ट टीम, गूगल मीट और गूगल क्लासरूम जैसे ऑनलाइन एजुकेश प्लेटफॉर्म इस्तेमाल कर रहे हैं। ये एप यूजर फ्रेंडली नहीं है। इस्तेमाल करने में विशेषज्ञ बनना पड़ता है।

-- ऑनलाइन पढ़ाई और अभिभावकों की मुश्किलें--
1. अभिभावकों को रोजाना क्लास के लिए स्कूल से भेजे गए आईडी-पासवर्ड से लॉगिन करना पड़ता है। इससे पहले पॉवर प्लग लगाना, कैमरा ऑन करना, चैट बॉक्स खोलने जैसी जिम्मेदारियां भी अभिभावकों को पूरी करनी पड़ रही है।
2. बच्चों को की-बोर्ड टाइपिंग की आदत नहीं होने से परेशानी आ रही। धीमी गति से काम करने से पिछड़ जाते हैं। सवालों के जवाब वक्त पर नहीं लिख पाते।
3. अभिभावकों की ड्यूटी : छोटे बच्चों के साथ अभिभावकों को दो से तीन घंटे तक बैठना पड़ता है। कामकाजी अभिभावक पूरी तरह उलझे रहते हैं।
4. वन-वे कम्युनिकेशन : कक्षा में वन-वे कम्युनिकेशन ही ज्यादा रहता है। शिक्षक बोलते हैं, विद्यार्थी सुनते हैं। बच्चों की आवाज शिक्षक बंद रखते हैं। एकसाथ 30-40 बच्चों की पढ़ाई के बीच बच्चा कुछ बोलने की कोशिश करे, तब तक शिक्षक आगे बढ़ जाते हैं।
5. नेटवर्क : इंटरनेट की कनेक्टिविटी अच्छी नहीं होने पर बार-बार क्लास में इंटरप्शन होता है। कभी शिक्षक तो कभी बच्चे की आवाज और तस्वीर नहीं आती। शिक्षक भी घर से कक्षाएं ले रहे, जिनके पास अच्छा ब्रॉडबैंड नेटवर्क नहीं होता।
6. लैपटॉप की जरूरत : एक से अधिक बच्चे हैं तो सबके लिए लैपटॉप की जरूरत महसूस होती है। चूंकि एन्ड्रॉइड मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर देखकर पढऩा-लिखना कठिन है।

jitendra paliwal Desk
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