दर्जनों गांवों में फाकाकशी लेकिन शराब से ‘तर’, गटक रहे 3 से 4 करोड़ की दारू

दक्षिणी राजस्थान की सीमा से सटे दर्जनों गांवों की आबादी में रहने वाले आदिवासी भले ही तंगहाली व फाकाकशी में जीवन बसर करते हो, लेकिन उनके गांवों की शराब की दुकानों का लेखा-जोखा देख हैरानी होती है।

उदयपुर। दक्षिणी राजस्थान की सीमा से सटे दर्जनों गांवों की आबादी में रहने वाले आदिवासी भले ही तंगहाली व फाकाकशी में जीवन बसर करते हो, लेकिन उनके गांवों की शराब की दुकानों का लेखा-जोखा देख हैरानी होती है।

 

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वहां लोग सालाना तीन से चार करोड़ की दारू (शराब) गटक रहे हैं। हकीकत में यह शराब आदिवासी नहीं बल्कि गांव से सटे गुजरात बॉर्डर पार के लोग पीते हैं, जिनको इन दुकानों से सीधी तस्करी कर पहुंचाई जाती है।

 

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जिले के खेरवाड़ा, गोगुन्दा व गिर्वा क्षेत्र की करीब डेढ़ दर्जन ऐसी दुकानें हैं, जहां प्रतिदिन की बिक्री उदयपुर शहर की लोकेशन पर स्थित दुकानों की बिक्री को मात दे रही है। आबकारी विभाग में खेरवाड़ा, गोगुन्दा व गिर्वा वृत्त में अनेक ऐसे गांव हैं, जहां आदिवासी लोग छितराई बस्तियों में टापरों में निवासरत है।

 

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इन लोगों की माली हालत पर गौर करें तो दोनों समय का भोजन भी ठीक से नसीब नहीं है, लेकिन इन गांवों में लाइसेंसी दुकानों से प्रतिदिन लाखों की शराब ब्रिकी का आंकड़ा पार होता है। इन दुकानों पर महंगी से महंगी अंग्रेजी शराब की ब्रांड मिलती है जिन्हें आदिवासी खरीद भी नहीं सकता।

 

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फोटो— प्रतीकात्मक तस्वीर

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