VIDEO : घर-घर झंडियां, बिल्ले-स्टीकर हुए गुम, ढोल-नगाड़ों ने साधी चुप्पी ....

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By: Sikander Veer Pareek

Published: 27 Nov 2018, 05:26 PM IST

मोहम्मद इलियास/ उदयपुर. चुनावी महासमर में पार्टी प्रत्याशी अपने प्रचार-प्रसार के लिए घर-घर जनसम्पर्क के साथ ही सोशल मीडिया पर सम्पर्क बनाए हुए हैं। कोई अपनी पार्टी की उपलब्धि गिना रहा है तो कोई बड़े नेताओं की सभा करवाकर मतदाताओं को रिझाने के जतन कर रहा हैं। चुनाव की आदर्श आचार संहिता के चलते चुनाव प्रचार का शोर थम गया लेकिन पार्टियों, उनके समर्थकों व कार्यकर्ताओं में छींटाकशी काफी बढ़ गई। राजस्थान पत्रिका ने आमजन, पार्टी कार्यकर्ता से बातचीत प्रचार के तरीकों पर बातचीत की तो अधिकतर ने अपने-अपने जमाने की बात कही। कुछ ने कहा कि दीवारों पर लिखे नारे ही अच्छे थे, उनमें कोई कांट छांट नहीं करता था। कोई प्रचार करने गली में आता तो सब दौड़ पड़ते थे। पार्टी कोई भी हो, बच्चे व बड़े उनके बैनर, बिल्ले व स्टीकर चाव से रखते थे। अब तो डर सा लगने लगा है, चुनाव शांति से निपट जाए इसी में सब भलाई समझते हैं।

वर्ष-1998
भोपू लगी गाडिय़ों के पीछे दौड़ते थे सब
गांव-कस्बों में चुनावी माहौल की अलग ही रंगत देखने को मिलती थी। उस दौरान भोपू लगी गाडिय़ां गांव में जैसे ही आती तो सभी गाड़ी को घेर लेते थे। उत्साहित बच्चे व युवा चुनावी सामग्री लेने को गाड़ी की ओर लपक पड़ते थे। जब तक उन्हें चुनाव सामग्री, बिल्ले व स्टीकर नहीं मिलते वे गाड़ी का पीछा नहीं छोड़ते थे। जिस पार्टी का बिल्ला होता वे उसी का नारा लगाते हुए गलियों में झंडियां लेकर घूमते थे। नारों से गांव की दीवारें रंगी रहती थी। चुनावी वर्ष में लोग दीपावली पर नारे के लिए अलग से दीवार तक को छोड़ देते थे। पेंटर दीवारों पर नारे लिखते नजर आते थे। कपड़ों के बैनर व कागज के बड़े-बड़े पोस्टर, प्रत्याशियों के फोटो वाली पर्चियों का काफी प्रचलन था। टेलीफोन डायरेक्ट्री देखकर मतदाताओं से फोन पर मतदान की अपील का सिलसिला चलता था। चुनाव चिह्न का भी अपना अलग क्रेज था, लोग चुनाव चिह्न के आधार पर भी लुभावने नारे बना देते थे। प्रचार के साथ बैलेट पेपर पर मुहर लगाकर भी गांव में बांटते थे ताकि उन्हें प्रत्याशी का निशान याद हो जाए। — भागवत चौहान, वयोवृद्ध समाजसेवी

 

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वर्ष- 2003
मिस कॉल देकर देते थे सूचना
इस चुनावी वर्ष में लोगों के हाथों मोबाइल आ गया था लेकिन कॉल दर अधिक थी। सूचना के लिए मिस कॉल व मैसेज का ज्यादा प्रचलन था। पेजर भी चुनाव प्रचार का जरिया बना। कपड़ों के बैनर व प्लास्टिक के बिल्लों की जगह फ्लेक्स ने ली। चमकीले फ्लेक्स जगह -जगह लगाए गए। गांव-कस्बों की चौपालों पर प्रत्याशियों की बड़ी सभाओं में होर्डिंग आकर्षण का केन्द्र रहे। जीपों व वाहनों पर छोटे आकार के फ्लेक्स भी काफी लगाए जाते थे। — हाजी अब्दुल गफ्फार, कांग्रेस कार्यकर्ता

 

वर्ष 2008
ढोल-नगाड़े बजा प्रत्याशी करते थे प्रचार
वर्ष 2008 के चुनावों में मकानों पर अपने-अपने समर्थकों के पार्टियों के झंडे-बैनर व पोस्टर लगाने का बड़ा प्रचलन था। गांव, शहर, कस्बों में सिर्फ यही नजर आते थे। लोग इन्हें देखकर भी पार्टी की हार-जीत की गणित व मतदाता के रूख के बारे में बता देते थे। कार्यकर्ता अपने प्रत्याशियों की प्राथमिकता, क्षेत्र में करवाए गए विकास कार्यों आदि के जानकारियों के पत्रक गांव-गांव पहुंचाते थे। साथ ही मतदाता पर्चियां भी डमी बैलेट पेपर के साथ हर घर तक पहुचाई जाती थी। गांव में प्रत्याशियों के पहुंचने पर ढोल-नगाड़े बजते। नुक्कड़ सभा व चौपाल होती थी। गांव में हांका करवाने के लिए बरसों से चली आ रही परम्परा भी यथावत थी। नाई या ढोली से हांका करवाकर लोगों को इकट्ठा करवाया जाता था। — अर्जुनलाल माली, भाजपा कार्यकर्ता

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