सामुदायिक वन अधिकार देने में एमपी-गुजरात से पीछे राजस्‍थान, सरकार के आंकड़ों में खुली पोल

सामुदायिक वन अधिकार देने में एमपी-गुजरात से पीछे राजस्‍थान, सरकार के आंकड़ों में खुली पोल

Mukesh Hingar | Updated: 25 Oct 2017, 05:24:20 PM (IST) Udaipur, Rajasthan, India

वन अधिकार कानून...

मुकेश हिंगड़/उदयपुर. आदिवासी एवं परंपरागत रूप से वनों में निवास करने वालों को वन अधिकार कानून के तहत सामुदायिक वन अधिकार (बुनियादी सुविधा) देने को लेकर हमारा प्रदेश पड़ौस के मध्यप्रदेश और गुजरात से बहुत पीछे है। हम सामुदायिक अधिकार पत्र देने के मामले में पिछले तीन सालों से बहुत पीछे चल रहे हैं।
इस कानून के लागू होने के सालों बाद जाकर लोगों को वन अधिकार पत्र मिले तो कई के दावों को खारिज करने के बाद उनकी फाइलों को वापस नहीं खोला गया। सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) के आंकड़ों पर नजर डाले तो ग्राउण्ड स्तर पर तेजी से काम नहीं हुआ। जिससे हमारा प्रदेश 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाया। राजस्थान में सामुदायिक वन अधिकार के लिए 692 दावे आए लेकिन अभी तक 75 को ही अधिकार दिए गए जबकि पास के राज्यों में इसकी संख्या बहुत ज्यादा है। यह अलग बात है कि पास के राज्यों में आवेदन ज्यादा आए लेकिन औसत उन्होंने उसका निस्तारण भी ज्यादा किया।


राजस्थान से सटे राज्य

राज्य प्राप्त दावे अधिकार पत्र दिए
राजस्थान 691 75
मध्यप्रदेश 39828 27510
गुजरात 7187 3516
उत्तरप्रदेश 1124 843

 

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सबसे ज्यादा सामुदायिक अधिकार यहां
मध्यप्रदेश 39828 27510
छत्तीसगढ़ 25977 12714
महाराष्ट 11408 5748
इन राज्यों की स्थिति बहुत कम
तमिलनाडू 3361 00
गोवा 361 03
हिमाचल प्रदेश 68 07
त्रिपुरा 277 55
(जुलाई 2017 तक जारी आंकड़े)

अधिकार पत्र के लिए दावे करने वालों की फाइले जहां दी वहां से आगे तक नहीं बढ़ी है। सामुदायिक अधिकार में भी व्यक्तिगत तौर पर जो अधिकार पत्र देने हैं उस पर काम नहीं हुआ है। ज्यादा बात बिगड़ती तो वन विभाग कहता है कि हमने तो वैसे ही छूट दे रखी है लेकिन छूट और अधिकार पत्र में फर्क होता है, कोई सुनने वाला नहीं है। जब कानून में अधिकार पत्र का प्रोविजन है तो बेकार के दूसरे तर्क क्यों दिए जा रहे हैं। भारत सरकार ने अभी जुलाई तक की प्रगति सामने रखी है, आगे के महीनों की रिपोर्ट दबाई जा रही है क्योंकि उसमें कोई प्रगति नहीं हुई है।
- मांगीलाल गुर्जर, सामाजिक कार्यकर्ता

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