निराली है यहां की रंग तेरस, यहां पुरुष मेवाड़ी पोशाक में सज धज कर खेलेंगे गैर तो महिलाएं करेंगी घूमर

रुण्डेडा की रंग तेरस 14 मार्च को , मेवाड़ी पोशाक में सज धज कर खेलेंगे गैर

By: madhulika singh

Published: 12 Mar 2018, 06:25 PM IST

उमेश मेनारिया/ मेनार. होली दहन के तेरहवें दिन मनायी जाने वाली रंग तेरस उदयपुर जिले के रूण्डेडा में बुधवार 14 मार्च को मनाई जाएगी । रंग तेरस रुन्डेडा का मुख्य त्यौहार है । इस दिन पूरे गांव को सजाया जाता है हर घर में पकवान बनते हैं । मेहमानवाजी होती है । दिन भर रंग गुलाल से खेलने के बाद सज धज कर सभी ग्रामीण मंदिर के यहाँ वृत्ताकार में हाथों में खांडे लेकर ढोल की थाप पर गैर नृत्य करते हैं । यहां इस त्योहार को अनोखे तरीके से मनाया जाता है। एक ओर यहां ग्रामीण पूरे दिन जहा कीचड़ रंग गुलाल से खेलते हैं। वहीं देर शाम को मेवाड़ी पोशाक में सजधजकर हाथों में खांडा लेकर गैर खेलते हैं, महिलाएंं बीच में स‍िर पर लाेटा लिए घूमर नृत्य करती हैं ।


रुण्डेडा रंगतेरस का इतिहास : रुण्डेड़ा ग्रामवासी करीब साढे चार सौ वर्षों से गांव में यह त्यौहार महात्मा जत्ती जी के क्लदास की स्मृति में उत्साह व श्रद्धा के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। रुण्डेड़ा ग्रामवासी उत्तर दिशा में स्थित धूणी पर गांव के पंच तीन ढोल, थाली और मदक के साथ पहुुंचते हैं। यहाँ पूजा-अर्चना कर जत्तीजी का ध्यान कर उन्हें कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है। जत्तीजी को आमंत्रित करने के बाद तीनों ढोल के साथ ग्रामीणजन रवाना होते हैं। वे मार्ग में डेमन बावजी को भी आमंत्रित कर आशीर्वाद लेते हैं और यहां से गांव के बड़े मंदिर पहुुंचते हैं। इस आयोजन में भाग लेने की रस्म पूरी कर जत्तीजी की अमानत माला, चिमटा व घोड़ी लेकर गैर नृत्य आरंभ किया जाता है। कुछ देर नृत्य के बाद ग्रामीण यहाँ से तलहटी मंदिर, निंबडयिा बावजी, जूना मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, महादेव मंदिर, जणवा समाज का मंदिर होते हुए पुनः बड़ा मंदिर ग्रामीणजन एवं मेनारिया समाज बंधु पहुंचते हैं।

 

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मेवाड़ी पोशाक में दूल्हे की तरह सजते हैं युवा , बच्चों से लेकर बुजुर्गों में भी सजने-संवरने का जबर्दस्त शौक

मंदिर में धोक व पूजा-अर्चना के बाद ग्रामीण अपने-अपने घरों पर पहुंचते हैं और यहाँ संवरने का कार्य शुरू होता है। ग्रामीण गांव में पहुँचे हुए अतिथि मेहमानों व रिश्तेदारों का आत्मीय स्वागत कर उन्हें अपने-अपने घरों पर ले जाते हैं और खान-पान का दौर चलता है। रात करीब 9 बजे ग्रामीणजनों का जत्था फिर चौक पर एकजुट होकर एकत्रित होते हैं, जहां ढोल की लय-ताल पर गैर नृत्य किया जाता है। इसमें बुजुर्गों सहित युवाओं व बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है। गैर नृत्य के साथ ही तलवार व आग के गोले से हैरतअंगेज कार्यक्रम प्रस्तृत किये जाते हैं। यह कार्यक्रम सुबह भोर तक जारी रहता है। कार्यक्रम का समापन आतिशबाजी व तोप चलाकर किया जाता है। इस आयोजन में ग्रामीणवासियों के साथ मेनारिया समाज, जाट समाज व जणवा समाज सहित सभी समाजबंधुओं का तनमन धन से का सहयोग मिलता है। यह त्यौहार आपसी भाईचारे का प्रतीक है।

RANG TERAS
madhulika singh Reporting
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