यहां 61 साल तक होती रही प्रभु श्रीनाथजी के सिर्फ बांये हाथ की पूजा, 1700 ईस्वी के बाद चरण कमल दर्शन में हुआ बदलाव

उदयपुर . ब्रजधाम गोवर्धन पर्वत में से 1401 ईस्वी में श्रीनाथजी का बायां हाथ प्रकट हुआ।

By: Dhirendra Kumar Joshi

Published: 12 Nov 2017, 04:46 PM IST

उदयपुर . ब्रजधाम गोवर्धन पर्वत में से 1401 ईस्वी में श्रीनाथजी का बायां हाथ प्रकट हुआ। 61 साल तक इसी बायां हाथ की पूजा होती रही। बाद में मुखारविंद और संपूर्ण स्वरूप प्रकट हुआ। 1670 ईस्वी में आक्रांताओं के हमले की आशंका पर प्रभु को लेकर सुरक्षित स्थान के लिए रवाना हुए। करीब 2 साल 11 महीने 5 दिन तक श्रीनाथजी को रथ में विराजित कर कई जगह घूमे और बाद में मेवाड़ के सिहांड में स्थायी रूप से विराजित हुए, जो आज वैष्णव नगरी के रूप में श्रीनाथ जी के रूप में ख्यात हैं।लोक मान्यता के अनुसार ब्रज के आन्योर गांव के सद्दू पांडे की गाय गोवर्धनजी जाकर श्रीनाथजी का अभिषेक करने लगी।

 


ईस्वी 1535 में चम्पारण में जन्मे वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग की स्थापना की। उन्होंने राग, भोग और शृंगार के माध्यम से पुष्टिमार्गीय पूजा पद्धति की शुरुआत की, जो आज तक विद्यमान है। राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में श्रीनाथजी : पुष्टिमार्गीय चित्रकला के बदलते आयाम विषयक शोध में यह जानकारी शामिल की गई। शोधकर्ता डॉ. वागीश शर्मा ने शोध में पाया कि नाथद्वारा की सेवा पद्धति की चरण दर्शन परम्परा में भी विशेष बदलाव आया है। 1700 ईस्वी तक श्रीनाथजी के चरणों का आड़ा अंकन किया जाता था। तिलकायत गोवर्धनलालजी (1688- 1723) के समय में चरण कमल दर्शन में बदलाव किया गया। तब से आज तक चरण कमलों का सीधा अंकन किया जाता है, ताकि सभी सेवकों और वैष्णवों को भगवान श्रीनाथ के संपूर्ण चरणों के दर्शन हो सकें।

 

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पुष्टिमार्ग की चित्रकला में हुआ बदलाव

शोध में सामने आया कि नाथद्वारा में सभी चित्रकार पूर्व में श्रीनाथजी के 7 साल तक के बालस्वरूप को ध्यान में रखते हुए भावपूर्ण चित्रण करते थे। चित्रांकन के लिए तिलकायत से विधिवत आज्ञा ली जाती थी। श्रीनाथजी की पिछवाई के पारंपरिक रंगों में बड़ा बदलाव आया। 1750 तक रंगों का परम्परागत और सर्वश्रेष्ठ उपयोग होता रहा। वर्तमान में मंदिर के अंदर तो परम्परागत भावपूर्ण अंकन आज भी विद्यमान है। मगर अब मंदिर परिसर के बाहर चित्रकार बाजार की मांग को देखते हुए चित्रों का अंकन करने लगे हैं।

 

ब्रज और मेवाड़ का संगम है पुष्टिमार्गीय चित्रकला
गोवर्धन (जिला मथुरा) में सांझी, फूल बंगला, भूमिचित्र, पट्टचित्र, आरती थाल पुष्टिमार्गीय सेवा में शामिल किए गए। नाथद्वारा में भी यह सेवा आज तक विद्यमान है। पुष्टिमार्गीय चित्रकला अब ब्रज और मेवाड़ का अटूट संगम बन गई है।

 

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35 माह 5 दिन तक रथ में ही विराजे प्रभु
शोध प्रबंध में बताया कि औरंगजेब ने 1670 में मथुरा में केशवराय मंदिर को तोडऩे का फरमान जारी किया था। इससे पहले गोविंदरायजी श्रीनाथजी को रथ में लेकर रवाना हो गए। श्रीनाथजी को आगरा, धनदौटी घाट चम्बल, किशनगढ़ के अजमती गांव, जोधपुर के चौपासनी, उदयपुर, घसियार स्थानों पर ले जाया गया। महाराणा राजसिंह ने तिलकायत को वचन दिया कि मेवाड़ का एक भी बालक जीवित रहने तक श्रीनाथजी को कोई आक्रमणकारी स्पर्श नहीं कर सकेगा। इसके बाद तिलकायत ने विक्रम संवत 1728 को श्रीनाथजी को नाथद्वारा (सिंहाड़) में विराजित किया। इससे पूर्व 2 साल 11 महीने 5 दिन तक श्रीनाथजी रथ में ही विराजित रहे।

 

पुष्टिमार्गीय सेवा पद्धति शाश्वत है और इसकी चित्रकला का विशिष्ट महत्व है। पुष्टिमार्ग के सेवा, कला आदि सभी आयाम मानव मात्र के पथ प्रदर्शक हैं। विश्वविद्यालय का आगे भी पुष्टिमार्ग की सेवा पद्धति और कला पर शोध कार्य जारी रहेगा।
प्रो. एसएस. सारंगदेवोत, कुलपति, राजस्थान विद्यापीठ विवि

Dhirendra Kumar Joshi Reporting
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